खुद को बदले बिना बदलाव नहीं आता -आचार्य प्रवर श्री विजय राजजी मसा 

रतलाम ,09 सितंबर | आचार्य श्री विजयराज जी मसा ने कहा है कि खुद को बदले बिना दूसरो में बदलाव का उपदेश सार्थक नहीं होता| पहले खुद में बदलाव आना चाहिए, लेकिन आज हम दूसरों की चिंता करते हैं| सबके अंदर स्वयं का चिंतन होना चाहिए, क्योंकि आत्म चिंतन की खुद में बदलाव लाता है| व्यक्ति दूसरों के बदलाव की चिंता करता है और चेष्टा भी करता है,मगर इसमें वह तब तक सफल नहीं होता,जब तक स्वयं में बदलाव न कर ले|
छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन देते हुए आचार्य श्री ने सन्मति के चौथे गुण स्थिरता की चर्चा करते हुए कहा कि व्यक्ति आज के युग में जितना अस्थिर हुआ है, उससे पहले कभी नहीं रहा है | सन्मति स्थिरता लाती है,स्थिरता जीवन का वरदान होती है| हर व्यक्ति को पहले खुद में स्थिर होना चाहिए एक स्थिरता सिर्फ कायिक नही होती, वह वाचिक और मानसिक भी होती है| कायिक स्थिरता से कायोत्सर्ग वाचिक स्थिरता से मौन तथा मानसिक स्थिरता से ध्यान होता है| तीनों तरह की स्थिरता जीवन को शक्तिशाली बनाती है। यंत्रो का जीवन जीने वाले अस्थिर होते है, जो यंत्रो का नही मंत्रो का जीवन जीते है , वे स्थिर होते है |
आचार्य श्री ने कहा कि बालकों को यंत्राधीन न बनाए | वे पालकों के सुधरने पर ही सुधर सकते है, इसलिए बालकों को सुधारनें से पहले पालकों को सुधरना चाहिए। बालक अपने पालकों से ही सीखते है। पालकों की चंचलता बालको को भी चंचल बना देती है। प्रारम्भ मे श्री विशाल प्रिय मुनि जी ने सम्बोधित किया | बाद मे उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनि जी ने अंतगढ़ सूत्र पर अपना प्रभावी उद्धोधन दिया। संजय मेहता ने 22 उपवास, निर्मला पिरोदिया ने आठ तथा ज्योति पिरोदिया ने 6 उपवास के प्रत्याख्यान लिए।