हिंदी के बिना कैसा विकास कैसी स्वाधीनता

रतलाम । दुनिया के किसी भी मुल्क का विकास उसकी मातृभाषा के माध्यम से ही संभव है अन्यथा विकास की सारी अवधारणा बिना मातृभाषा के निरर्थक है कहने का तात्पर्य यह है कि मातृभाषा के मार्ग से ही विकास की इबारत लिखी जाती है मातृभाषा के साथ विकास और मातृभाषा के बिना स्वाधीनता की कल्पना नहीं की जा सकती। उक्त विचार 14 सितंबर हिंदी दिवस के अवसर पर शिक्षक सांस्कृतिक संगठन द्वारा आयोजित हिंदी के बिना कैसा विकास और कैसी स्वाधीनता विषय पर आयोजित परिचर्चा में नगर के शिक्षाविद बुद्धिजीवियों ने व्यक्त किए । विषय प्रवर्तन प्रस्तुत करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मुरलीधर चांदनी वाला ने कहा कि देश को आजाद हुए 72 वर्ष पूरे हो चुके हैं जहां से हमें देश आजाद मिला था हिंदी की दशा आज भी वैसी ही है जैसी आजादी के पहले थी महात्मा गांधी जवाहरलाल नेहरु, आचार्य विनोबा भावे, सरदार पटेल जैसे महान नेताओं की परिभाषा रही हिंदी आजादी के बाद वह स्थान अर्जित नहीं कर पाई जिसकी वह पात्र थी । हिंदी के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार हुआ है उसे उत्तर की भाषा मानकर दक्षिण क्षेत्र के लोगों के लिए सदैव भड़काने का कार्य किया जो हिंदी के स्थापन अभियान में तथा देशव्यापी भाषा बनने में अत्यंत बाधक रहा है ।
हिंदी को वाजिब स्थान दिलाना प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य होना चाहिए सरकार के साथ-साथ राजनेता सामाजिक साहित्यकार पत्रकार शिक्षक यदि स्थान ले तो यह कार्य संभव नहीं है। संस्था अध्यक्ष दिनेश शर्मा ने कहा कि हिंदी हमारी संस्कृति की जननी है हमारी सांस्कृतिक उन्नति में हिंदी का महत्वपूर्ण स्थान है क्षेत्रीय भाषाएं सब उसकी छोटी बहन ने जिन्हें हिंदी ने हमेशा सम्मान दिया है लेकिन हिंदी को इन छोटी बहनों ने वह सम्मान नहीं दिया जिसकी वह अधिकारी है ।
उत्कृष्ट विद्यालय के वरिष्ठ व्याख्याता श्री गिरीश सारस्वत ने कहा कि हिंदी और विकास दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं दुनिया के तमाम मुल्कों ने विकसित राष्ट्रों ने अपनी उन्नति का मार्ग अपनी भाषा के साथ तय किया है सोवियत रूस जापान जर्मनी इन देशों ने बिना अंग्रेजी की सहायता लिए दुनिया में विकास के झंडे गाड़े हैं अत: यह कहना अत्यंत गलत होगा की हिंदी विकास में बाधक है हिंदी के साथ है विकास का मार्ग आसानी से तय कर सकते हैं । पूर्व अध्यक्ष कृष्ण चंद्र ठाकुर ने कहा कि हिंदी तो हमारी माता है जिसकी गोद में हम पले बढ़े और प्रतिष्ठा प्राप्त की है हिंदी से हमारा मान और सम्मान है । राधेश्याम तोगड़े ने कहा कि हिंदी समूचे भारत का एक गौरवशाली तंत्र जो हम सबको एकता के सूत्र में पिरोता है संपर्क का माध्यम हिंदी की मिठास किसी अन्य भाषा में बिल्कुल नहीं पाई जाती हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने में हमारी क्षेत्रीय राजनीति बाधक बनी हुई है । पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी डॉ सुलोचना शर्मा ने कहा कि हिंदी भाषा जैसी मिठास और कहां है हिंदी में शब्द रचना काव्य रचना गद्यांश पद्यांश कविता यह सब एक अलौकिक शाब्दिक वातावरण निर्मित करते हैं जो हम सबको जोडऩे का कार्य करती है । वरिष्ठ हिंदी व्याख्याता डॉ पूर्णिमा शर्मा ने कहा कि हिंदी जन-जन की भाषा है मुझे गर्व है कि मैं हिंदी पढ़ाती हूं हिंदी सिखाती हूं और हिंदी में अपना जीवन जीविका चलाती हूं हिंदी का गौरव कि हमारा गौरव हिंदी का विकास और स्वाधीनता ही हमारा विकास और स्वाधीनता है हिंदी के साथ हमारी प्रतिष्ठा और सम्मान जुड़ा हुआ है ।
देवेंद्र वाघेला ने कहा कि हम हिंदी के प्रति ठीक वैसा व्यवहार रखें जैसा हम हमारी माता के साथ रखते हैं हमें स्वयं से सम्मान देना होगा तभी इसका गौरव पूरे राष्ट्र में स्थापित होगा हिंदी को राष्ट्र के गौरव के साथ जोड़कर देखना चाहिए जिस प्रकार हम आजादी के लिए लड़े उसी प्रकार हिंदी को राष्ट्र बनाने भाषा बनाने के लिए भी संघर्ष करें । कवि श्याम सुंदर भाटी ने कहा कि हम भारतीयों का गौरव हिंदी भाषा से जुड़ा हुआ है हमारी स्वाधीनता और हमारा विकास हिंदी के बिना अधूरा है हिंदी का विकास ही देश का विकास है हिंदी की स्वतंत्रता ही देश की स्वाधीनता है । शिक्षिका भारती उपाध्याय ने कहा कि हिंदी भाषा से हमारा वही रिश्ता है जो एक मां का अपने बच्चों के प्रति होता है तथा बच्चों का अपने मां के प्रति होता है । शिक्षक रमेश उपाध्याय ने कहा कि हिंदी को हिंदी भाषियों से भी उतना ही खतरा है जितना अन्य भाषा से है हिंदी का विरोध हिंदी भाषी लोग ही करते हैं जो अत्यंत दुखदाई है। शिक्षक दशरथ जोशी ने कहा कि हिंदी को हमें हमारी जीविका का माध्यम बनाकर रक्षा करनी होगी हिंदी के प्रति हमारा नजरिया एकदम वैज्ञानिक और व्यवसायिक होना चाहिए ।
लायंस क्लब रतलाम कीझोन चेयर पर्सन पूर्व शिक्षिका वीणा छाजेड़ ने कहा कि हिंदी एशिया महाद्वीप की बहुत महत्वपूर्ण भाषा है भारत के साथ-साथ पड़ोसी देशों पाकिस्तान मारीशस श्रीलंका वर्मा आदि देशों में भी हिंदी बड़े चाव से बोली जाती है इसके गौरव के साथ भारतीयों का सम्मान जुड़ा हुआ है । शिक्षिका अंजुम खान ने कहा कि हिंदी की शब्द रचना और भावों अलंकारों का कोई तोड़ नहीं है पवित्रता और प्रतिष्ठा के यदि बात की जाए तो हिंदी जैसी कोई भाषा नहीं है । रक्षा के कुमार ने कहा कि हिंदी हमें आत्मीयता और स्नेह का आभास दिलाती है अपनेपन का गीत है हिंदी राग और अनुराग का मिश्रण है हिंदी ।
सचिव दिलीप वर्मा ने कहा कि हिंदी को अपना गौरव प्राप्त करने के लिए हिंदी भाषियों के साथ संघर्ष करना पड़ रहा है देश का दुर्भाग्य है कि 80 करोड़ लोग जो हिंदी बोलते हैं उसे हम राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दे पाए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा । प्रतिभा चांदनी वाला ने कहा कि हमारे संस्कारों का प्रतिबिंब है हिंदी भाषा समूची भारतीय संस्कृति का दर्पण है हिंदी भाषा की कल्पना नहीं की जा सकती विकास और स्वाधीनता दोनों हिंदी भाषा के गौरव हैं । चंद्रकांत वाफगांवकर ने कहा कि हिंदी को हिंदी बनाना सबसे बड़ी चुनौती है हम अंग्रेजी के पीछे भागते हैं लेकिन हमारा अस्तित्व और पहचान हिंदी से है । वरिष्ठ शिक्षक राजेंद्र सिंह राठौड़ ने कहा कि हिंदी को जितना अंग्रेजी से खतरा नहीं है उतना हिंदी भाषियों से हिंदी के प्रति हमारी उपेक्षा ही इसके विकास में बाधा है । क्षत्रिय वैभव के संपादक नरेंद्र सिंह पवार ने कहा कि हिंदी को इसका मूल स्थान सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए अर्थात इसे राष्ट्रभाषा का मान सम्मान देकर प्रत्येक भारतीय का माल बढ़ाना चाहिए । शिक्षिका नूतन मजावदीया ने कहा कि हिंदी जैसी शब्द रचना काव्य रचना अन्य भाषाओं में बिल्कुल भी नहीं दिखाई देती हिंदी का गौरव इसकी मिठास और अलंकारों में है हिंदी हमें शालीन संस्कारी बनाती है हमारी संस्कृति का मूल स्वरूप हिंदी भाषा है । परिचर्चा में श्री नरेंद्र सिंह राठौर, मिथिलेश मिश्रा, आरती त्रिवेदी, कविता सक्सेना, अनिल जोशी, मदन लाल मेहरा, मनोहर प्रजापति, कमल सिंह राठौड़ आदि ने भाग लिया । संचालन दिलीप वर्मा तथा आभार राधेश्याम तो पड़े ने व्यक्त किया