रूप मोह से स्वरूप की अनुभूति नहीं होती” – श्री श्री 108 मुनि श्री सद्भाव सागर जी मसा.

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रतलाम, 23 अक्टूबर 2025,गुरुवार को श्रुति संवर्धन वर्षा योग 2025,श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर स्टेशन रोड, रतलाम आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी म. सा. के शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी म.सा. एवं क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा चंद्रप्रभा मंदिर मे पाट पर विराजित है।
स्थानीय मंदिर प्रांगण में आयोजित धार्मिक प्रवचन में सीता हरण प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए श्री श्री 108 मुनि श्री सद्भाव सागर जी मसा ने कहा कि – “जो रूप को देखते हैं, वे स्वरूप को नहीं देख पाते, और जिसने स्वरूप को देख लिया, उसके लिए जगत के सारे रूप फीके पड़ जाते हैं।”
मुनि श्री ने कहा कि रावण का पतन केवल उसके बल या बुद्धि के कारण नहीं, बल्कि मोह के कारण हुआ।
उन्होंने कहा –
“जब रावण ने सीता का रूप देखा, तो वह मोह में इतना डूब गया कि उसे धर्म-अधर्म का भान ही न रहा। मोह का नशा से भी अधिक भयंकर होता है – क्योंकि अन्य नशे का असर उतर जाता है, पर मोह का नहीं।”
लक्ष्मण और खर-दूषण के युद्ध का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने बताया कि रावण ने छल का सहारा लेकर साधु का वेश बनाया और भिक्षा माँगने के बहाने सीता के समीप गया।
“जब धर्मात्मा का वेश लेकर कोई छल करता है, तब लोग धर्म पर ही संदेह करने लगते हैं,” मुनि श्री ने कहा।
उन्होंने आगे कहा कि सीता द्वारा लक्ष्मण रेखा लाँघने का प्रसंग केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन का संदेश है –
“जब हम संयम की रेखा लाँघते हैं, तब अनर्थ निश्चित होता है।”
जटायू प्रसंग का वर्णन करते हुए मुनि श्री ने बताया कि किस प्रकार उस पक्षी ने धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राणों का त्याग किया।
“जब व्यक्ति पर मोह का विष चढ़ता है, तो वह जीव को जीव नहीं समझता,” उन्होंने कहा।
प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने श्रावकों को संदेश दिया —
“किसी को भी जीवन में परखने से पहले उसकी संगति और व्यवहार से जाँचो, जैसे सोने की परख कसने से होती है।” उक्त विचार अपने प्रवचन श्रृंखला में दिए।
श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन श्रावक संघ, श्री विद्या सिंधु महिला मंडल श्री विमल सन्मति युवा मंच एवं सकल दिगंबर जैन समाज के पदाधिकारी एवं सदस्य बड़ी संख्या में कथा का श्रवण कर रहे हैं उक्त जानकारी चंद्रप्रभ दिगंबर जैन श्रावक संघ संयोजक मांगीलाल जैन ने दी।

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