सुग्रीव-राम संवाद से मिली जीवन नीति: परोपकार ही सज्जनों की विभूति – मुनि श्री सद्भाव सागर जी म.सा.

रतलाम। आज दिनांक 25 अक्टूबर 20 25 शनिवार को श्रुति संवर्धन वर्षा योग 2025,श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर स्टेशन रोड, रतलाम आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी म. सा. के शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी म.सा. एवं क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा चंद्रप्रभा मंदिर मे पाट पर विराजित है।
मुनि श्री सद्भाव सागर जी ने अपने उद्बोधन में कहां की अब वह राम के पास चला जाता है राम के पास जाने के बाद वह सुग्रीव कहता है आपके शौर्य की चर्चा मैंने कई व्यक्तियों से सुनी है आप शूरवीर,मर्यादा,धर्मात्मा, पुण्यात्मा पुरुष है और सज्जन पुरुष वही होते हैं जो सहयोग और पुण्य के मार्ग पर तत्पर् है सज्जनों की प्रथम पहचान ही यही है परोपकार करना ही सज्जनों की विभूति है जो परोपकार से युक्त होते हैं वे ही इस अवनी तल पर सज्जन होते हैं इनका मन साधु साधु पुरुषों की भाति, सहयोगियों के प्रति सहयोग से भरा हुआ है वही धर्मात्मा होते हैं राम ने सुग्रीव का दुख सुना और उसके राज्य पर दूसरे ने अधिकार कर लिया है राज्य और स्त्री के समागम न होने के कारण वह दुखी था। इधर राम की तो खुद की स्त्री अलग हो गई थी। राम से पहले सुग्रीव हनुमान के पास गए थे तो हनुमान ने देखा की दो सुग्रीव सामने खड़े हुए हैं इन दोनों में डिफरेंट कैसे करें और अगर मैं असली को मार दिया तो बहुत बड़ा घात हो जाएगा। मेरे हाथों कहानी असली सुग्रीव का घात ना हो जाए इसलिए वापस आ गए आगे जाकर राम के पास में पहुंचते हैं और सुग्रीव सोचते हैं कि यह भी मेरे जैसे स्त्री वियोग में दुखी है इसलिए मेरे दुख को समझ सकते हैं। और सुग्रीव राम की शरण में जाते हैं। राम ने कहा हम तुम्हें तुम्हारा राज्य और स्त्री दिला देंगे तुम्हें भी हमारा ध्यान रखना होगा।
कहीं आप किसी की सभा में जाओ भगवान को नमस्कार करो गुरु को नमस्कार करो और यथा योग्य स्थान पर बैठ जाओ ऐसा नहीं कि कहीं पर भी बैठ जाओ। पद्म पुराण जो पढ़ लेता है उसको लोक की सारी नीति रीति का ज्ञान हो जाता है संसार में जितने भी दुखी लोग हैं उनके दुख का कारण रीति और नीति का ज्ञान नहीं है। रीति और नीति का ज्ञान नहीं होने से आपसे बड़े आपसे रुष्ट हो जाते हैं व्यक्ति कभी दूसरे की इच्छा पूर्ति करने से दुखी नहीं होता अपने अहंकार से दुखी होता है किसी बड़े ने आपको डांट दिया तो आपका चिंतन बदल गया अच्छी बात भी बुरी लगने लग जाएगी। हर व्यक्ति पर का सहयोग करता है बदले में व्यक्ति अपना भी सहयोग चाहता है कह नहीं पता वह बात अलग है। कभी भी उदार बनकर जीना विश्वास मानना पुण्य वृद्धि होने होते देर नहीं लगेगी।किसी ने उपकार किया है तो समय आने पर उनका ऋण चुकाना चाहिए। माता-पिता उपकार करते हैं जन्म देकर ग्रुप कार्य करते हैं शिष्य के शिष्यत्व को जन्म देकर गुरु ज्ञान देते हैं यही आपके ऊपर उपकार है जहां-जहां जैसे-जैसे जिस नीति से सेव करके हमें उपकार चुकाना चाहिए। जिनके ग्रुप प्रसन्न है उनके जीवन में खिनता नहीं है उनके पुण्य का पलड़ा हमेशा भारी रहता है उक्त विचार अपने उद्बोधन में दिए।
श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन श्रावक संघ, श्री विद्या सिंधु महिला मंडल श्री विमल सन्मति युवा मंच एवं सकल दिगंबर जैन समाज के पदाधिकारी एवं सदस्य बड़ी संख्या में कथा का श्रवण कर रहे हैं। उक्त जानकारी चंद्रप्रभ दिगंबर जैन श्रावक संघ संयोजक मांगीलाल जैन ने दी।

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