आत्मोपकार ही सच्चा धर्म, शुद्धि और पुरुषार्थ पर दें ध्यान-मुनि श्री 108 निर्णय सागर जी महाराज

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रतलाम। श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में विराजित मुनि श्री 108 निर्णय सागर जी महाराज ससंघ ने अपने प्रवचन में आत्मशुद्धि, भाषा ज्ञान और आत्म कल्याण के महत्व पर गहन विचार व्यक्त किए।
मुनि श्री ने कहा कि आज मनुष्य जितना अधिक बाहरी संसाधनों में उलझता जा रहा है, उतना ही वह अध्यात्म से दूर होता जा रहा है। उन्होंने आचार्य परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि प्राचीन आचार्यों ने आत्मकल्याण के लिए व्यवहार और अध्यात्म—दोनों का संतुलन स्थापित किया।
उन्होंने तीन प्रकार की शुद्धि—मन, वचन और काया—पर विशेष जोर देते हुए कहा कि सच्चा साधक वही है, जो इन तीनों को शुद्ध रखने का प्रयास करता है। आचार्य परंपरा में आयुर्वेद, व्याकरण और अध्यात्म ग्रंथों की रचना इसी उद्देश्य से की गई, जिससे मनुष्य अपने जीवन, भाषा और विचारों को शुद्ध कर सके।
भाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि व्याकरण के बिना भाषा की सही समझ संभव नहीं है। गलत शब्द प्रयोग से अर्थ का अनर्थ हो सकता है, इसलिए सही भाषा और अभिव्यक्ति का ज्ञान आवश्यक है। उन्होंने वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चों में लेखन और भाषा ज्ञान की कमी बढ़ती जा रही है, जिस पर ध्यान देना जरूरी है।
प्रवचन में मुनि श्री ने आत्मज्ञान की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि केवल बाहरी पहचान ही वास्तविक पहचान नहीं है। “मनुष्य अपने नाम, परिवार और व्यवसाय को ही अपनी पहचान मानता है, जबकि वास्तविक पहचान आत्मा की है, जिसे जानना और अनुभव करना ही सच्चा ज्ञान है,” उन्होंने कहा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि परोपकार के कार्य जैसे भूखे को भोजन कराना, प्यासे को पानी देना या सेवा करना अच्छे हैं, लेकिन वास्तविक कल्याण आत्मोपकार से ही संभव है। “जब तक व्यक्ति आत्मा को नहीं पहचानता, तब तक सच्चा कल्याण नहीं हो सकता,” मुनि श्री ने कहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, श्रावक एवं चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंडल उपस्थित रहा, जिन्होंने प्रवचन का लाभ लिया।

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