रतलाम,23,अगस्त। साधना में मन तपना चाहिए। तन को तपाना महत्वपूर्ण नहीं होता, अपितु मन तपना चाहिए। हमारे अंदर से जब तक मन नहीं तपता, तब तक साधना का लक्ष्य पूर्ण नहीं होता है।
यह बात मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी मसा निर्भय ने कही। मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में प्रवचन देते हुए प्रवर्तकश्री ने कहा कि हमारी जिदंगी कषायांे में बीत रही है। कषायों से हम अपने आत्म गुणों की घात कर रहे है। आज व्यक्ति के लिए घर, परिवार छोडना सरल है, लेकिन कषायों को छोडना आसान नहीं है। काम, क्रोध, लोभ, मान, माया आदि कषायों का छूटना बहुत ही मुश्किल हो गया है। लेकिन सच्चाई ये है कि जब तक धर्म मय जीवन नहीं जिएंगे, तब तक आत्मा का कल्याण नहीं होगा।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि साधक के लिए अपने दोष देखना जरूरी है। यदि दोष नहीं देखेगा, तो मिथ्यात्म में रहेगा और पाप करता रहेगा। पाप में मन रमण करे, तो प्रायश्चित करना चाहिए। सामायिक इसके लिए श्रेष्ठ उपाय है। इसमें प्रायश्चित करते हुए दोषों का शोधन करना चाहिए। प्रवर्तकश्री ने कहा कि मनुष्य की देह अनंत पुण्य से मिलती है, लेकिन इसे कषाय नष्ट कर रहे है। व्यक्ति को मरने की इच्छा नहीं करना चाहिए, लेकिन क्रोध और मान कषाय में लोग मर जाते है। कषायों से बचते हुए साधना से जीवन को जो मंगलमय बनाते है, वही आत्मा का कल्याण करते है। तप आराधना करते समय कुछ पाने का भाव नहीं होना चाहिए। तप करने पर पद मिलेगा, सम्मान मिलेगा, ये भाव रहे, तो तप कमजोर हो जाता है।
प्रवचन को आरंभ में उपप्रर्वतनी, महासती, प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ने संबोधित किया। उनके साथ ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी मसा एवं सेवाभावी श्री कल्पनाजी मसा, एवं श्री दर्शनमुनिजी मसा मंचासीन रहे। इस दौरान श्री धर्मदास जैन श्री संघ सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे। संचालन आयुष गंग ने किया।