रतलाम 29 अगस्त। मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी मसा निर्भय ने कहा कि जीवन प्रवृत्ति और निवृत्ति प्रधान होता है। हर मनुष्य का लक्ष्य पाप से निवृत्ति और धर्म में प्रवृत्ति का होना चाहिए। तीर्थंकर प्रभु ने यही संदेश दिया है। उनका ज्ञान कभी अधूरा नहीं होता, लेकिन हम उसे पूरा ग्रहण नहीं कर पाते।
प्रवर्तकश्री ने मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में प्रवचन देते हुए कहा कि सामायिक करते समय एक-एक पाप को याद करना चाहिए। मन को समझाने के लिए सिर्फ पाठ नहीं बोलना चाहिए, अपितु आत्म चिंतन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों में धर्म के संस्कार थे, वे धर्म में जीते थे, लेकिन हमारी प्रवृत्ति दूसरों की देखा-देखी में पापमय ज्यादा हो गई है। पानी का ही उदाहरण ले, तो हमारे पूर्वज बहुत कम पानी का उपयोग करते थे, जबकि हम पानी का अपव्यय कर रहे है। सामायिक में चिंतन करो कि कहा-कहा पाप हो रहा है और बाद में उससे बचने का पूरा प्रयास करो।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि धर्म याद करने के लिए अपितु जीने के लिए है। यदि पाप से निवृत्ति होगी, तो धर्म अपने आप हो जाएगा। पहले बहने खुद सारे काम करती थी, फिर भी सामायिक करती और व्याख्यान सुनती थी अर्थात उन्हें समय मिलता था, लेकिन अब सारे काम नौकर करते है, फिर भी समय नहीं मिलता। मन की प्रवृत्ति यदि धर्म की होती है, तो जीवन धर्ममय होता है। अन्यथा सारे कार्य औपचारिक रहेंगे। उन्होंने कहा कि धर्मी जीव सदैव चिंतन करता है, इसलिए सभी चिंतन करे और धर्मी बने।
प्रवचन को आरंभ में उपप्रर्वतनी, महासती, प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ने संबोधित किया। उनके साथ ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी मसा एवं सेवाभावी श्री कल्पनाजी मसा, एवं श्री दर्शनमुनिजी मसा मंचासीन रहे। प्रवचन के दौरान श्री धर्मदास जैन श्री संघ सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे। संचालन आयुष गंग द्वारा किया गया।