आकांक्षा, संघर्ष और स्वप्न ही कहानी का यथार्थ – प्रो. चौहान

जनवादी लेखक संघ द्वारा कहानी पर आयोजन

रतलाम। कहानी मनुष्य की आकांक्षा, उसके जीवन संघर्ष और उसके सपनों की दास्तान होती है। एक कहानी के भीतर जीवन धड़कता है। एक कहानी के भीतर पूरी की पूरी एक कविता गति करती हुई दिखाई देती है। कथाकार आशीष दशोत्तर की कहानी झुर्रियां भी जीवन संघर्ष के साथ समय की विसंगतियों को सामने लाती है और इशारों ही इशारों में वह सब कुछ कह जाती है जो हर दौर में कहना ज़रूरी है।
उक्त विचार जनवादी लेखक संघ रतलाम द्वारा आयोजित कहानी पाठ एवं विमर्श आयोजन की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि और अनुवादक प्रो. रतन चौहान ने व्यक्त किए। कथाकार आशीष दशोत्तर की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘वागर्थ’ में प्रकाशित चर्चित कहानी ‘ झुर्रियां ‘ पर केन्द्रित आयोजन में प्रो. चौहान ने कहा कि समाज में व्याप्त विसंगतियों को एक कहानीकार ही सामने लाता है। कहानीकार बताता है कि किस तरह संघर्षशील व्यक्ति को मुख्य धारा से दूर किया जा रहा है। किस तरह पूरे के पूरे वर्ग को उपेक्षाओं की तरफ़ धकेला जा रहा है।कहानीकार की चिंता पूरे समाज की चिंता होती है। वह अपने एक पात्र के माध्यम से आर्थिक , सामाजिक और राजनीतिक चेतना के स्तर पर सभी कुछ कह जाता है। झुर्रियां कहानी भी इसकी मिसाल है। वरिष्ठ कवि श्याम माहेश्वरी ने कहा कि कहानी नवोन्मेष का बेहतरीन उदाहरण है।‌
वरिष्ठ रंगकर्मी कैलाश व्यास ने कहानी पर प्रेमचंद के वक्तव्य को पढ़ते हुए कहा कि यह कहानी हर मापदंड पर खरी उतरती है । इसमें एक संघर्षशील जीवन की अभिव्यक्ति हुई है । वरिष्ठ शायर सिद्धीक़ रतलामी ने कहा कि कहानी में जो कुछ घटित हो रहा है , वह दिखता है लेकिन उसके पीछे जो कुछ घटित हो रहा है , वह नहीं दिखता है । कहानी के पीछे चल रही कहानी को समझना ही इस कहानी की सफलता है। डॉ. गीता दुबे ने अपनी समीक्षा करते हुए कहा कि यह कहानी खाली हाथों के दर्द को उभारती है । यह एक इंसान के ध्वस्त होते सपनों की कहानी है ।
मांगीलाल नगावत ने कहा कि सामाजिक रूप से हाशिए पर डाले जा रहे मनुष्य का संघर्ष इस कहानी में उभर कर सामने आया है । यह मेहनतकश वर्ग के संघर्षों को भी दर्शाती है। जनवादी लेखक संघ के सचिव रणजीत सिंह राठौर ने कहा कि यह कहानी कहानीकार की पिछली कहानियों से आगे जाती हुई प्रतीत होती है । इस कहानी की बुनावट साहित्य की स्थापित कहानियां की बानगी प्रस्तुत करती है । विनोद झालानी ने कहा कि कहानी में जीवन का सच उभर कर सामने आता है । नरेन्द्र सिंह डोडिया ने जीवन के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहानी की मीमांसा करते हुए इस कहानी को प्रभावी दुष्यंत कुमार व्यास ने कहा कि कहानी के तत्व इसमें शामिल हैं और यह कहानी अपनी बात को कहने में पूरी तरह सफल रही है ।आई.एल. पुरोहित ने कहा कि तांगे वाले के चरित्र के माध्यम से व्यवस्था की विसंगतियों को भी बखूबी उजागर किया गया है। आशा श्रीवास्तव ने कहानी को प्रेरक बताया । पुष्पलता शर्मा ने कहा कि इस कहानी के माध्यम से एक कहानीकार का समाज के प्रति दृष्टिकोण सामने आता है। कीर्ति शर्मा ने कहानी को भावप्रवण बताया।

कहानी में सत्य का समावेश
कहानीकार आशीष दशोत्तर ने कहानी ‘झुरियां’ का पाठ किया। यह कहानी जीवन के के एक ऐसे सत्य पर आधारित है जिससे आम आदमी बहुत प्रभावित है। एक बूढ़ा व्यक्ति जिसकी हाथों की रेखाएं जीवन संघर्ष में ख़त्म हो चुकी है, उसका आधार कार्ड बनवाने के लिए कोई इंप्रेशन नहीं मिल पाता है और वह किस दौर से गुज़रता है उसका चित्रण कहानी में है। श्री दशोत्तर ने कहानी पाठ करते हुए कहा कि कहानी में इंटेंसिटी और ड्रेमेसिटी का एलिमेंट महत्वपूर्ण होता है जो पाठकों को बांधे रखता है।

इनकी रही मौजूदगी
इस अवसर पर वरिष्ठ रंगकर्मी ओमप्रकाश मिश्र, हीरालाल खराड़ी, सरिता दशोत्तर, एस.एन. सोढ़ा, गीता राठौर, एस.के. मिश्रा, कैलाश वशिष्ठ, कला डामोर सहित सुधिजन मौजूद थे। संचालन रणजीत सिंह राठौर ने किया तथा आभार जितेन्द्र सिंह पथिक ने माना। अंत में जलेसं इंदौर के दिवंगत अध्यक्ष रजनीरमण शर्मा को श्रद्धांजलि दी गई।

तरही नशिस्त 13 सितंबर को
जनवादी लेखक संघ उर्दू विंग संयोजक सिद्धीक़ रतलामी ने बताया कि जलेसं द्वारा प्रारंभ तरही नशिस्त के तीसरे सोपान पर 13 सितंबर रविवार को प्रातः 11 बजे शहीद भगत सिंह पुस्तकालय शहर सराय रतलाम पर तरही मुशायरे का आयोजन होगा। इसमें तरही मिसरे ‘ फूलों से ज़ख़्म खाए हैं हमने बहार में ‘ पर रचनाकार अपनी ग़ज़लें पढ़ेंगे। उन्होंने ग़ज़ल में रूचि रखने वाले सभी सुधिजनों से उपस्थिति का आग्रह किया है।

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