
इंदौर (राजेश जैन दद्दू)। दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के उन्नायक पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज (विराजमान – दिल्ली ऋषभोदय) ने धर्मसभा में कहा कि मनुष्य जीवन का सर्वश्रेष्ठ श्रृंगार संयम है।
गुरुदेव ने आज अपनी मंगल देशना में 6 सूत्रों में जीवन का सार बताया:
- संयम जीवन का श्रृंगार – संयम सुर-दुर्लभ है। इसके लिए स्वर्ग के देव भी तरसते हैं। प्राणियों की रक्षा करना प्राणि-संयम और भोगों से विरक्त होना इन्द्रिय-संयम है।
- संसार भ्रमण से बचो – अविद्या, मोह, राग-द्वेष के कारण जीव चतुर्गति में भटक रहा है। शाश्वत सुख चाहिए तो यथार्थ तत्वबोध कर आवागमन पर विराम लगाओ।
- भगवत् भक्ति सुखदातार – प्रभु भक्ति से पुण्य बढ़ता है, पाप का क्षय होता है और वही मुक्ति का आधार है।
- सच्चे शास्ता में आस्था करो – परीक्षा लेकर सच्चे, संयमी, ज्ञानी-ध्यानी गुरु को ही अपना आराध्य बनाओ। अधर्मी और राग-द्वेष से मलिन को देवता मत मानो। आस्था निर्दोष परमात्मा में और समर्पण सच्चे गुरु में होना चाहिए।
- इच्छाओं का विराम ही दीक्षा है – अपनी अनंत इच्छाओं को रोकना ही दीक्षा है। जो भव्य जीव भावपूर्वक संयम धारण करता है, वह स्वर्ग, तीर्थंकर और चक्रवर्ती पद तक पाता है।
- ठुकराओ मत, धर्म सिखाओ – सबके दिन एक से नहीं होते। किसी को हीन-दीन मत समझो। निर्धन को धन, भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, रोगी को औषधि दो और सभी को सत्य का बोध कराकर धर्म सिखाओ।