निर्बन्ध रहोगे, तो जल्दी तिरोगे – श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनिजी मसा

रतलाम 03 सितंबर। जीवन में किसी से गांठ नहीं बांधो। किसी से बंधना भी मत। उलझना भी मत और उपकार का भाव रखो, तब भी बंधो मत। निर्बन्ध रहोगे, तो ही जल्दी तरोगे। मानव भव को सार्थक करना हो, तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया सभी कषायों को छोडकर आत्म विजेता बनने का प्रयास करना चाहिए।
यह बात मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी मसा निर्भय ने कही। मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि मोह कर्म बंधता रहता है, इसलिए उससे सदैव बचनेे का प्रयास करना चाहिए। आजकल जो भाई-बहन बडे प्यार से रहा करते थे, वे भी जरा-जरा सी बात पर झगडने लगते है। ये पुरूषार्थ, निकृष्ठ पुरूषार्थ है। झगडने से पहले सोचना चाहिए कि हम क्यों घृणा पालकर बैठे है और अपनी गति बिगाड रहे है।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि मोह कर्म का सबसे ज्यादा खतरनाक रूप घृणा है। रागी गुण देखते है और नजरिया बदलते ही घृणा हो जाती है। मोह कर्म से बचंेगे,तो सारी समस्याओं से बच जाएंगे। समभाव से कर्म भोगने वाले के कभी नए कर्म नहीं बंधते। इसलिए कोई भी कर्म विशेषकर मोह कर्म बांधने से बचने के लिए समभाव में रहना चाहिए।
आरंभ में उपप्रर्वतनी, महासती, प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ने प्रवचन किया। उनके साथ ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी मसा एवं सेवाभावी श्री कल्पनाजी मसा, एवं श्री दर्शनमुनिजी मसा मंचासीन रहे। प्रवचन के दौरान श्री धर्मदास जैन श्री संघ सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे। संचालन आयुष गंग द्वारा किया गया।

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