

नई दिल्ली (राजेश जैन दद्दू) दिल्ली, ऋषभोदय में विराजित दिगम्बर जैनाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा में संबोधन करते हुए कहा कि जीवन अमूल्य है।
जीवन अमूल्य है –
गुरुदेव ने कहा, धन-धरती का प्राप्त होना सरल है, स्वर्ग आदि एकत्रित किया जा सकता है। पद-प्रतिष्ठा प्राप्त करना भी पुरुषार्थ-साध्य है, परन्तु मनुष्य-भव पुनः प्राप्त करना अत्यंत कठिन है।
ज्ञानम सुखस्य कारणं –
संसार में सुख का कोई कारण है, वह ज्ञान ही है। आत्म-ज्ञान सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। शास्त्र-पुराण का ज्ञान भिन्न है, आत्मानुभव रूप निराकुल परिणाम भिन्न हैं। जैसे कोई वैद्य है, पर वह कुपथ्य करना नहीं जानता तो वह रोग से अनजान है। वैसे ही शब्द-ज्ञान के साथ आत्म-ज्ञान भी होना चाहिए।
हीन-भावना महा-रोग है –
दुनिया में अनेक प्रकार के लोग हैं, कोई किसी के गुणों को नहीं देखना चाहता। हर कोई दूसरे के गुणों की वृद्धि को सहन नहीं कर पाता, इसलिए जिनके साथ निवास करते हैं, उनके समक्ष भी अपने गुणों का प्रचार नहीं करना चाहिए।
हीन-भावना में जीना और दूसरों को हीन-भावना में डालना, दोनों ही खतरनाक हैं। हीन-भावना एक महा-रोग है, जो मानव को शक्तिहीन, निरुत्साह और निराश कर देता है। सज्जन पुरुष न स्वयं हीन-भावना में जीते हैं और न ही किसी अन्य को हीन-भावना में डालते हैं।
गगन में उड़ना है तो नमना सीखो –
आपको प्रसिद्धि पाना है तो पहले सिद्धि प्राप्त करो। गगन जैसी ऊँचाइयाँ पाना है तो विनम्र, विनयशील बनो। विनय व्यक्ति को महान बना देती है। लघुता ही प्रभुता प्रदान करती है। उठना है तो झुकना सीखो। विनय से गुणों में वृद्धि होती है और विनयवान को सब चाहते हैं।
सफलता का सूत्र – गम खाओ, कम खाओ, नम जाओ –
गुरुदेव ने सफलता का सूत्र देते हुए कहा – ऊँचाइयाँ पाना है तो गम खाओ, कम खाओ, नम जाओ। स्वयं आगे बढ़ो, सबको आगे बढ़ाओ। विषमवाद की स्थिति में शांत रहो, भूख से अधिक भोजन मत करो, बड़ों के प्रति नम जाओ। कम खाओगे तो स्वस्थ रहोगे, नम जाओगे तो संघर्ष नहीं होगा।
चाह और चिंता से बचो –
जीवन में हमेशा प्रसन्न रहना सीखो। कष्ट में झुलो मत, सुखों में फूलो मत। चाह मत करो, चिंता से अपनी रक्षा करो। चाह और चिंता मनुष्य के लिए बहुत घातक हैं।