आत्म जागरण से ही होती है परमात्म की प्राप्ति – श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनिजी मसा

रतलाम । यह जीवन मोह में खोने के लिए नहीं है। सबको पता है कि संयम उत्तम है। धर्म, ध्यान, तप, जप करना अच्छा है, लेकिन इसके बाद भी बहुत कम लोग ही करते है। यह जागने का समय है। अपनी बोधि को जगाओ और जान जाओ कि इन्द्रियों को जागरण कोई जागरण नहीं है। परमात्म की प्राप्ति आत्म जागरण से ही होती है।
यह बात मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी मसा निर्भय ने कही। मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन का सार बताते हुए कहा कि परमात्मा पर भाव से हटने और स्व भाव में आने का संदेश देते है। इससे कई लोगों का आत्म कल्याण हुआ और वे सम्यत्व को प्राप्त हुए। करूणा का भाव सम्यक दर्शन की निशानी होता है। यदि कुछ कर नही सको, तो भाव तो शुभ कर ही सकते है। मन में संवेदना जागना चाहिए। यदि भाव नहीं बदले, तो पर भाव में मोह, माया, मान लोभ, क्रोध आदि कषायों आते है। इनसे राग-द्वेष होता है और दया नहीं आती। करूणा नहीं जागे, तो समझ लेना चाहिए कि ऐसी आत्मा सम्यत्व को कभी प्राप्त नहीं कर सकती है।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि जैन दर्शन, खुद को सुधारने का दर्शन है। सुधरने का भाव यदि जाग जाए, तो समझ लेना कि बोधि आ गई। साधु-संत समाज में सुधार के लिए ही कार्य करते है। उनसे प्रेरणा लेकर सबको धर्म, ध्यान, तप, जप और संयम की अग्रसर होना चाहिए।
धर्मसभा को आरंभ में प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ने संबोधित किया। रानी-उत्तम मूणत ने 5 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। अन्य तपस्वियों ने भी अलग-अलग प्रत्याख्यान लिए। संचालन रखब चत्तर द्वारा किया गया। इस दौरान सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी मसा, प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी मसा, महासती श्री कल्पनाजी मसा मंचासीन रहे। धर्मसभा में प्रदेश और देश के विभिन्न स्थानों से गुरूभक्तों ने दर्शन-वंदन कर आशीर्वाद लिया। इस दौरान श्री धर्मदास जैन श्री संघ के सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे।

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