पर्व पर्युषण का छठा दिन : आयम्बिल तप से रसना इन्द्रिय पर विजय प्राप्त होती है – तप चक्रेश्वरी श्री अरुणप्रभा जी मसा

रतलाम । अंतगढ़ सूत्र का वांचन और व्याख्या करते हुऐ महासतीजी ने फरमाया की आयम्बिल तप करने वाले की रक्षा करने वाले स्वंय विमलादेव होते है। कृष्ण की द्वारिका नगरी शापित थी लेकिन आयम्बिल के तप के प्रभाव से शाप के बाद भी लगातार 12 वर्षों तक सुरक्षित रही एंव जैसे ही आयम्बिल की लड़ी खंडित हुई द्वारिका नष्ट हो गई।
आयम्बिल तप से रसना इन्द्रिय पर विजय प्राप्त होती है, आयम्बिल का रूखा सूखा बिना तला गला बिना मिर्च मसाले का उबला हुआ भोजन दिन में केवल एक वक्त करने से शरीर भी स्वस्थ रहता है और मन भी प्रसन्न रहता है। और रुके हुए कार्य मनोरथ सब पूर्ण होते है।
महासतीजी ने फरमाया की मैं स्वंय पिछले पच्चीस वर्षों से अधिकतम दिनों में आयम्बिल करती हूँ और अपने आप को सदैव स्वस्थ्य एंव प्रसन्न महसुस करती हूँ। (विगत रहे की अभी मसा का लगातार 83वाँ आयम्बिल चल रहा है और दिनाँक 4 सितंबर को 90 आयम्बिल की पूर्णाहुति होगी)
मधुर गायिका गुरु निधि जी मसा ने फरमाया की साधना को निष्फल मत जाने दो, आराधना के फल को चखने दो, विराधना से अपने आप को बचने दो।
धर्म की सामायिक, साधना की पूजा, भक्ति भाव की भूमि का हमारे जीवन में बहुत अधिक महत्व है। साधना केवल शरीर से नही शरीर से मन तक, मन से आत्मा तक और आत्मा से परमात्मा तक पंहुचाना चाहिए।
एक इंसान को जितना मिलता है उतना तो देवताओं को भी नही मिलता है, तिर्यंच और नारकी का तो प्रश्न ही नही है। इंसान चाहे तो भगवान बन सकता है, भगवान से ऊपर उठ सकता है और राक्षस से भी नीचे गिर सकता है। मनुष्य भव उपजाऊ मिट्टी के समान है जिसमें आप नन्दनवन लगा सकते है, कल्प वृक्ष लगा सकते हो या पाप की फसल उगा सकते हो। देवता यानि संगमरमर के फर्श के समान जो होता तो सुन्दर और चमकीला है लेकिन वो न तो फूल उपजा सकता है न काँटे । मनुष्य चाहे तो अपने जीवन को महकता हुआ गुलदस्ता बना सकता है ये बनेगा धर्म से साधना से। हमें अच्छे के साथ अच्छा बनना ही है और साथ ही बुरे के साथ भी अच्छा बनना है । हीरे से हीरे को तराशा जा सकता है लेकिन कीचड़ से कीचड़ को साफ नही किया जा सकता है।
धर्म कोई क्रिया नही है, आप जो पूजा सामायिक करते हो वो तो परंपरा रिवाज है। सामायिक करते करते आपके भीतर समभाव कैसे आए और समभाव आ भी जाए तो सद्भाव कैसे आए इस दिशा में प्रयास करो। बुराई को भूलना सीखो, जब कोई हमारे साथ बुरा करे तो उस बात को भूलना सीखों, नही तो हमारे मन में उसके प्रति कभी प्रेम नही आ पाएगा, और तब तक हमारी आत्मा शुध्द नही हो सकती है।
भवनों से नही भावना से महान बनों साधनों से नही साधना से महान बनो । साधना चाहे धर्म की हो या कर्म की, परिवार के लिए जो कर्म करते है वो भी एक साधना है। आपका नियम है रोज एक सामायिक करने का वो भी एक साधना है । सबकी साधना सिद्धि तक पँहुचे यह आवश्यक नही है। साधना करते करते मन भटक जाता है, साधना करते हुए मन प्रसन्न न हो तो साधना फलित नही होती है। न कामना हो न वासना हो आओ करे ऐसी साधना सच्चे दिल से साधना करने वालों की साधना कभी निष्फल नही जाती है। साधना से सिंचित हो आपका हर एक पल।