सत्य का नजारा चारों तरफ मौजूद है ,सिर्फ आंखों से असत्य का चश्मा निकालकर देखने की आवश्यकता है – अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज

सम्मेदशिखर जी 23 सितम्बर । इस सदी के सबसे कम उम्र के तपस्वी ,मौन साधक सम्मेद शिखर में पारसनाथ टोंक पर साधना करने वाले एवं परम पूज्य तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त एवं इस सदी के महान संत संत शिरोमणि गुरुवर आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज से सिंह निष्क्रिय व्रत धारण करने वाले परम पूज्य प्रातः स्मरणीय अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज का मंगल साधना स्वर्णभद्र टोंक पर कूट पर निर्विघ्न चल रही है इस साधना में प्रतिदिन का अनमोल मौन उवाच लोगों को मिल रहा है इसी क्रम में आज गुरुदेव ने अपने उवाच में कहा बुद्धि ,विवेक,सोच ओर सत्य का कुछ ऐसा अंदाज रखो… कि कोई अंदाज भी ना लगा पाये….।
तेल की एक बूंद वैसे ही सत्य है जिसे लाखों बूंद ठंड पानी कभी मिटा नहीं सकती है वैसे सत्य जीवन्त और शास्वत है ,जिस शख्स को ना थोपा जा सकता है,ना सत्य का आवरण ओढ़ा जा सकता है। इसलिए संत, फकीर, गुरु, सदगुरु और ग्रंथ..सत्य को ना सिखा सकते हैं ,ना बता सकते है। सत्य का बोध करा सकते हैं, सच की राह दिखा सकते हैं ,जहां चलना और देखना तो स्वमं को ही पड़ेगा ।सत्य का नजारा चारों तरफ मौजूद है ,सिर्फ आंखों से असत्य का चश्मा निकालकर देखने की आवश्यकता है ओर मन के कोलाहल को शांत होने की जरूरत है ।मन सत्य को ही स्वीकार करता है ,लेकिन असत्य का कोलाहल उस सत्य को स्वीकार करने नहीं देता।
गुरु सतगुरु प्रेरणा दे सकते हैं, प्रेरित कर सकते हैं लेकीन परेशान नहीं कर सकते हैं ।गुरु सद्गुरु प्रेरणा ,सलाह ओर सहयोग दे सकते हैं लेकिन सत्य को सिखा नहीं सकते हैं। गुरु और ग्रंथ दर्पण की तरह है। उसमें आप अपना चेहरा और चरित्र देख तो सकते हैं परंतु ठीक तो स्वमं को ही करना पड़ेगा । दर्पण ओर डॉक्टर एक जेसा काम करते हैं। दर्पण प्रतिबिंब दिखाता है ओर डॉक्टर रोग को बताता है ।दर्पण चेहरे से दाग को ठीक नही कर सकता और डॉक्टर रोग को नही भगा सकता
सौ बात की एक बात सत्य को स्वमं देखना,जानना ओर जीना पड़ता है।इसलिये सत्य का फल मीठा है ओर असत्य का कड़वा…..।
संकलन कर्ता कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा,कोलकोत्ता से विवेक गंगवाल

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