- जैन समाज को भावनात्मक आत्मीय सन्देश
- शब्द मौन से ज्यादा कीमती हो, तब बोलकर..
- अन्यथा सरकार का मौन होकर विरोध प्रदर्शन करना चाहिए..!

शिखर जी । शाश्वत तीर्थराज सम्मेद शिखरजी के लिये गाँव, शहर, नगर और देश में जो विरोध प्रदर्शन हो रहा है – यह सब शासनिक, प्रशासनिक, राजनैतिक दांव पेंच है, इसके अलावा कुछ नहीं है। जिसमें सब कुछ उल्झा हुआ है, कुछ भी स्पष्ट नहीं है। विरोध प्रदर्शन करने वालों को यह नहीं पता कि वह विरोध किस चीज का कर रहे हैं-? मन्च के वक्ताओं को नहीं पता कि उन्हें बोलना क्या है-? और हमारी मांग क्या है-?
केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, दोनों का एक ही लक्ष्य है, कि जैन समाज की इस आवाज़ को, बिगड़ते माहौल को, तीर्थराज सम्मेद शिखर की स्वच्छता, पवित्रता एवं मधुबन को अहिंसक क्षेत्र बनाने के लिये इस विरोध प्रदर्शन को, इस आंदोलन को कैसे शांत किया जाये, ये उनकी राजनीति की रणनीति है। देश की जैन समाज ने जो आंदोलन किया, वह अद्भुत, अद्वितीय और सराहनीय कार्य है – जो आपने संगठित होकर सम्पूर्ण देश और केन्द्र सरकार को दिखा कर एक बेजोड़ उदाहरण प्रस्तुत किया। तीर्थराज सम्मेद शिखर की वास्तविकता, हकीकत और सच्चाई से आप हम सब अनभिज्ञ हैं। जैन समाज और सरकार की सोच में जमीन आसमान का अंतर है। तीर्थराज सम्मेद शिखर के इतिहास से, वर्तमान और भविष्य की वास्तविकता से अनभिज्ञ होते हुये आप से जो जैसा बोल देता है, हम वैसा सच मानकर उसे सोशियल मीडिया का मसाला बना देते हैं।
एक ने कहा – हुआ,, तो सब चिल्लाने लगे – हुआ हुआ हुआ। पर क्या हुआ, यह किसी को नहीं पता कि क्या हुआ-?
सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि झारखंड, बिहार व बंगाल में देश के विरोध प्रदर्शन का कोई भी असर नहीं था, ना ही कोई प्रभाव पड़ा। यहां सब कुछ वैसा ही चल रहा है, जैसे चल रहा था और वैसा ही चलता रहेगा, जैसा चल रहा है। यहां पर शासन, प्रशासन और लोकल जैन समाज को कोई भी चिन्ता नहीं है।
तीर्थराज सम्मेद शिखर पहाड़ आज वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा पारसनाथ वन्य अभ्यारण्य झारखण्ड है, जिसका वन मण्डल हजारीबाग है, और इसका अधिकारी है डीएफओ जो आईएफएस (इंडियन फॉरेस्ट सर्विस ) का अधिकारी होता है। वन विभाग के अपने नियम कानून हैं। वह ना किसी की सुनते हैं, ना सुनना चाहते हैं। वन विभाग की अपनी एक गाइड लाइन है जिसे वह समग्रता से जीते हैं।
अभी 18 दिसंबर, 2022 को केंद्र सरकार की ओर से बड़े अधिकारियों की एक टीम सर्वेक्षण के लिए आई थी, उसमें सभी कद पद वाले बुद्धिजीवी, बड़े अधिकारी थे। उन्हें पारसनाथ पर्वत के सन्दर्भ में अपनी रिपोर्ट देनी थी केंद्र सरकार को।
महापारणा महा प्रतिष्ठा के सचिव श्री आकाश जैन उन सभी अधिकारियों को मेरे पास लेकर आये। सभी अधिकारियों ने नमन वन्दन किया। हमने सभी को आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा – गुरूदेव हम लोग केन्द्र सरकार की ओर से यहां सर्वेक्षण के लिये आये हैं। आपका मार्गदर्शन चाहिए। हमने कुछ महत्वपूर्ण बिन्दू उनको लिखकर दीये जिसे आकाश सर ने पढ़कर सुनाये। उन्होंने बहुत सी गूढ़ बातें कही जो हम इसमें उल्लिखित नहीं कर सकते। क्योंकि वह एक ऑफिशियल विजिट थी…
तीर्थराज सम्मेद शिखरजी के कुछ ऐसे मुद्दे और बातें हैं जो 90 प्रतिशत दिगम्बर जैन के लोगों को नहीं पता।
सौ बात की एक बात
तीर्थराज सम्मेद शिखर की समस्याओं का समाधान केवल और केवल कानूनी तौर तरीके से ही हो सकता है, अन्यथा जंगल में मोर नाचते किसने देखा-? क्योंकि यहाँ बहुत से मेटर ऐसे हैं जो आपस में उल्झे हुये हैं, कुछ मेटर कानूनी रूप से उलझे हुए हैं तो कूछ मेटर आपस में। यहाँ पर किसी एक संस्था का अस्तित्व नहीं है, यहां डोली वालों का, मजदूर संगठन का भी हस्तक्षेप है और सभी अपने-अपने तरिके से इस पर्वत पर मालिकयत हक जमाते हैं।
जैसे –
- दिगंबर तीर्थ क्षेत्र कमेटी में 13/20 पन्थ की मालिकयत।
- आनद जी कल्याण जी पेढ़ी की अपनी मालिकयत।
- जैन श्वेताबर सोसायटी की अपनी मालिकयत।
- वन्य जीव अभ्यारण्य की अपनी मालिकयत। (वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी, दिल्ली)
- राज्य वन विभाग गिरिडीह की अपनी मालिकयत।
- राज्य पर्यटन विभाग झारखण्ड की अपनी मालिकयत।
- लोकल ग्रामीण आदिवासियों की अपनी मालिकयत।
- डोली, मजदूर संस्थाओं की अपनी मालिकयत।
ये सब ऐसे लोग हैं, जिनका पारसनाथ पहाड़ से सीधा सम्बन्ध है। सबकी अपनी ढपली अपना राग, एक अनार सौ बिमार वाली कहावत यहाँ चरितार्थ हो रही है। यदि किसी एक संस्था ने कुछ भी कार्य किया तो दूसरी संस्था तुरन्त विरोध केस लगा देती है और अच्छे कार्य को बाधित करा देती है।
हम 01 मार्च, 2022 को पारसनाथ की स्वर्ण भद्र कूट पर आये थे – तप साधना करने के लिये। चरणों में बैठे थे, आंखें पारसनाथ भगवान के चरणों को देख रही थी। मन में विचार आया कि जब हम 2001 में आये थे तब भी यह टोंक ऐसी ही थी और आज भी ऐसी ही है। क्यों ना इसके नाम को सफल सार्थक करके स्वर्ण मयी बनवा दिया जाये। हमने रामपुरिया जी और शिखर चंद जी को बुलवाया और मन की बात कही। दोनों लोगों ने सहज ही मेरी भावना को समझा और बोले, गुरूदेव जो आपकी आज्ञा, और देखते देखते पारसनाथ टोंक वाकई में स्वर्ण भद्र कूट बन गई।
एक शाम पारसनाथ मन्दिर के बाहर बैठकर सामायिक कर रहा था,नजर पड़ी चौपड़ा कुण्ड पर – सामायिक में प्रार्थना की – हे वन देवता, पर्वत के रक्षक देवी देवता, यदि मेरी तप साधना में सच्चाई हो तो जिनके पास चौपड़ा कुण्ड मन्दिर की चाबी है, उनको मेरे पास लेकर आओ। आकाश सर सुबह आकर बोलते हैं गुरूदेव चौपड़ा कुण्ड के स्टाफ आप से मिलना चाहते हैं। हमने कहा – शाम को बुला लो। आकाश सर ने उनको मैसेज दिया और द्वारका जी, अजित राय अपनी टीम के साथ पारसनाथ भगवान के चरणों में आये। हमने उनसे लिखकर कहा – इसमें भगवान का क्या दोष है भाई-? ना भगवान का अभिषेक हो रहा, ना पूजा-पाठ, ना आरती, ना साफ सफाई। आप लोग क्या चाहते हैं -? अजित राय जी और द्वारका जी एक स्वर में बोले, हे गुरूदेव – आप जो कहेंगे हम वैसा कर देंगे। खुशी से मेरी आँख छलछला गई। हमने कहा – हम आपकी सभी मांग पूरी करेंगे, आप मन्दिर को खोल दो।
अक्षय तृतीय के दिन उन्होंने 42 महिने से बन्द परमात्मा को बन्धन मुक्त कर दिया। और यह एक संयोग ही कहो कि मेरे 16 उपवास का पारणा था और हमने वहीं से दर्शन किये, अभिषेक देखा और पारणा के लिये गणधर टोंक पर आ गये। *चौपड़ा कुण्ड की जर जर स्तिथि को देखकर मन में आया कि इसका जीर्णोद्धार करवा देना चाहिए, और काम भी शुरू करवा दिया। आधा काम हुआ ही था कि हमारे अपने ही कुछ लोगों ने काम रूकवा दिया।
*नीचे सम्मेदाचल जिनालय के द्वार खुलवाये, वहां की साफ-सफाई चल ही रही थी कि कुछ तथाकथित लोगों ने रातों रात नयी समिति बनाई और पुलिस को भेज दिया कि ये लोग यहां पर अनाधिकृत अधिकार जमा रहे हैं और वहां भी काम रूकवा दिया। *हमने 35 साल के सन्यास काल में कोई गिरी गिरा नहीं बनाये, कोई मठ संस्था नहीं बनाई, कोई गुमराह तन, सिद्धायतन नहीं बनाया, ना कभी फण्ड इक्_ा किया, ना कभी पूजा, विधान, मुर्ति, शान्तिधारा को व्यापार बनाया।
हाँ इतना जरूर करता हूं -जहां कहीं, जिस मन्दिर, या तीर्थ क्षेत्रों में जाता हूं और वहां कोई जरूरत या आवश्यकता होती है, तो अपने कुछ चुनिन्दा गुरू भक्तों से बोल कर वह कार्य करवा देता हूँ, और आगे निकल जाता हूँ। कहीं भी हमने अपनी मालिकयत का ठप्पा नहीं लगाया और ना कभी लगायेंगे। इसलिए मैं हमेशा बोलता हूँ – *हमको श्वेताम्बर और सोनगढ़ वालों से जितना खतरा नहीं है, उससे ज्यादा खतरा तेरह पंथी की सोच से है।
आप पैसे से प्रशासन को खरीद सकते हैं,, किस्मत, कर्म और कानून को नहीं..
पैसे से जमीन खरीद सकते हैं,, किसी के जज्बात नहीं..
पैसे से पुस्तकें खरीद सकते हैं,, ज्ञान नहीं..
पैसे से भोजन खरीद सकते हैं, भूख नहीं..!
आज तीर्थराज सम्मेद शिखर पर न जाने कितने केस चल रहे हैं, सब अपना-अपना हक जमाते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी पारसनाथ भगवान का अतिशय कहो या चमत्कार कि यहां लाखों जैन अजैन तीर्थ यात्री आते हैं,, श्रद्धा भक्ति से दर्शन वन्दन करते हैं और अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करके चले जाते हैं और भी बहुत कुछ ऐसा है जो हम ना लिख सकते, ना आपको बता सकते…
आज जैन समाज को बहुत गम्भीरता के साथ चिंतन मन्थन और अध्य्यन करने की आवश्यकता है।
कुछ चिन्तन बिन्दु
अजैन दर्शनार्थी की अत्यधिक भीड़ होने से पर्वत की अपवित्रता पर उनके विवेक का अभाव।
हमारी कमेटीयों के पदाधिकारीयों में आपसी सम्वाद – समन्वय की कमी।
पर्वत पर खान-पान और गन्दगी करने में सबसे ज्यादा दिगम्बर जैन भाइयों की महती भूमिका।
हमने देखा, जाना और अनुभव किया कि – 99त्न पर्वत की दुकानों पर श्वेताम्बर जैन यात्री ना कुछ खरीदते हैं, ना दुकानों पर खाते हैं, सिर्फ दिगम्बर जैन यात्रियों के अलावा।
साधु सन्त कितना भी प्रवचनो में, तीर्थ यात्रियों से कहें कि आप पर्वत पर ना कुछ खाये, ना कुछ खरीदे, ना ही रूपये पैसे का लेन देन करे,, इतना कहने के बाद भी यह सब कार्य बड़े धड़ल्ले से रोज हो रहे हैं।
जैन श्वेताम्बर यात्री पेन्ट शर्ट में पारसनाथ भगवान के ना चरण छूते हैं, ना गर्भ गृह में जाते हैं। और दिगम्बर जैन यात्रियों का आप हाल ही मत पूछो मेरे भाई।
सभी व्यवस्थायें दिगम्बर जैन यात्री ही खराब करते हैं और करवाते हैं।
जो हमने 9-10 महिनों में देखा, जाना और समझा — वह आप अपनों से शेयर किया।
जो बात मेरी बुरी लगे या समझ नहीं आये तो..
समझना वही बात आपके काम की है..!
अभी जो जैन समाज ने तीर्थराज सम्मेद शिखरजी के नाम पर एकता का सन्देश दिया, उससे इतना फायदा हुआ है कि केन्द्र सरकार और राजनीति में आप लोगों की उपस्थिति दर्ज हो गई, कि हम लोग भी आंदोलन करके विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। तीर्थराज सम्मेद शिखरजी का एक ही समाधान है – हम आपस में मिलजुल कानूनी कोर्ट केस को समिट करें, समाज के करोड़ो रूपये की बरबादी से बचायें और सभी तीर्थों के संरक्षण, सम्वर्धन में लगायें और समाज में जागरूकता का भाव जगायें। इस महान प्रदर्शन में सांध्य लक्ष्मी के संपादक श्रीमान शरद जी ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और समाज को बार बार सावधान भी किया कि ऐसा कोई भी कार्य या विरोध प्रदर्शन मत करना जिससे समाज को आपके कार्य क्रिया का खामियाजा भोगना पड़े। इस उम्र में जो शरद जी तीर्थ क्षेत्र और कमेटियों को दिशा निर्देश दे रहे हैं, वह सराहनीय, प्रशंसनीय और अनुकरणीय कार्य है।
एक निवेदन – जो तीर्थ क्षेत्रों के केस चल रहे हैं और उन केसो में जो समाज का पैसा बरबाद हो रहा है, यदि वह पैसा उस तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टी या पदाधिकारी अपने पॉकेट से खर्च करते हैं तो समाज पर उनका बहुत बड़ा एहसान होगा। उक्त जानकारी कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा ने दी ।