रतलाम,18 अप्रैल। संसार की माया अजब-गजब है। इसमें पुत्र, उसके पुत्र के लिए पिता से लडता है और वहीं पुत्र बडा होकर फिर पिता से लडता है। इस क्रम में लडने वाले को क्या मिलता है, वह तो जैसा आया था, वैसा ही चला जाता है। इस दुरास्थिति से बचना है, तो खुद का चिंतन करो। तीर्थंकर भी सामान्य जीवन जीते है, लेकिन उनकी पहचान असामान्य होती है। क्योंकि उनका पूरा जीवन स्वयं के कल्याण में समर्पित होता है।
यह बात श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी मसा ने कही। नोलाईपुरा स्थित श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल स्थानक में प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि जैसे नए मकान की पहचान अलग होती है, वैसे ही तीर्थकर भगवान का जीवन सबसे अलग हटकर अपनी पहचान रखता है। साधक अवस्था में ही आत्मबोध होता है। जिनशासन में चिंतन पर जोर दिया गया है, क्योंकि चिंतन से ही व्यक्ति सही दिशा पाकर इस भव सागर से पार हो सकता है। उन्होंने कहा कि आत्मा जब स्वयं का चिंतन करती है, तभी व्यक्ति आत्म कल्याण के मार्ग पर चल सकता है। विंडबना है कि वर्तमान में लोग काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया में उलझे हुए है। व्यक्ति जिस शरीर के लिए कई जतन करता है,वहीं उसे धोखा देता है। इसलिए उचित समय पर उचित कार्य करना चाहिए। प्रवर्तकश्री ने कहा कि संतो के जीवन में धर्म की प्रधानता होती है, जबकि श्रावक-श्राविका के जीवन में कर्म प्रधान होता है। धर्म आराधना तभी सफल होगी, जब उसे सही समय पर किया जाएगा। घर में कोई बीमार हो, तो सेवा छोडकर धर्म आराधना करना उचित नहीं रहता।
अभिग्रहधारी श्री राजेशमुनिजी मसा ने धर्म का महत्व बताते हुए कहा कि सबकों यह समझना आवश्यक है कि धर्म अपने लिए ही होता है। यह भावना जागृत होने पर ही वर्षीतप जैसे संकल्प पूरे होते है। धर्म अनादिकाल से चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा। लोग इसे झूठ से चलाने का प्रयत्न करते है, लेकिन झूठ कभी धर्म नहीं होता।
प्रवचन के दौरान श्री दर्शनमुनिजी मसा, पूज्य श्री अभिनंदन मुनि जी मसा एवं महासती श्री रमणीक कुँवर जी मसा, पूज्या श्री चंदना जी मसा, पूज्या श्री लाभोदया जी मसा, पूज्या श्री जिज्ञासा जी मसा पूज्या श्री चंदनबाला जी मसा, पूज्या श्री कल्पना जी मसा आदि ठाणा उपस्थित रहे। संचालन रखब चत्तर ने किया। प्रभावना का वितरण डाडमबाई-सुजानमल एवं बाबूलाल मेहता परिवार तथा विनोद झामर-छाया झामर की तप आराधना के उपलक्ष्य में जया संघवी एवं पूजा श्रीमाल द्वारा किया गया।