आत्मा के बिना शरीर की कीमत नहीं, जब तक है आत्मा कर लो धर्म साधना-इन्दुप्रभाजी म.सा.

  • सुबह उठते ही अवश्य फेरे परमात्मा के नाम की माला-चेतनाश्रीजी म.सा.
  • रूप रजत विहार में रविवार को चातुर्मासिक प्रवचनमाला में उमड़े श्रावक-श्राविकाएं

भीलवाड़ा 9 जुलाई (निलेश कांठेड़) । हमारा शरीर लिफाफा और आत्मा उसमें रखा हुआ चेक है, जैसे ही आत्मा रूप चेक निकला शरीर रूपी लिफाफे की कोई कीमत नहीं रह जाएगी। इसलिए जब तक शरीर में आत्मा है तब तक जितना हो सके उतनी धर्म साधना, आराधना कर लो। यहीं हमे आत्मकल्याण के पथ पर ले जाएगी। ये विचार शहर के चन्द्रशेखर आजादनगर स्थित स्थानक रूप रजत विहार में रविवार को नियमित चातुर्मासिक प्रवचनमाला में मरूधरा मणि महासाध्वी श्रीजैनमतिजी म.सा. की सुशिष्या मरूधरा ज्योति महासाध्वी इन्दुप्रभाजी म.सा. ने व्यक्त किए। उन्होंने तप साधना का महत्व बताते हुए कहा कि तपस्या करने से कर्मो की निर्जरा होती है और भव भ्रमण भी मिट सकता है। हमारी मौज-मस्ती की इच्छाएं कई बार धर्म साधना में रूकावट बन जाती है। हम अपने मन को वश में करके इच्छाओं पर नियंत्रण कर सकते है। सब इच्छाएं बूरी नहीं होती लेकिन जो हमारे हित में नहीं है और धर्म की राह पर आगे बढ़ने से रोकती है उन्हें खत्म करना होगा। जैन रामायण का वाचन करते हुए साध्वी इन्दुप्रभाजी ने बताया कि किस तरह दूसरे तीर्थंकर अजीतनाथजी के समय में इन्द्रदेव ने 700 योजन भूमि पर लंका बसाई। उससे पहले वहां राक्षस नाम का टापू था। लंका बसाकर उसे राजा हानवाहन को दिया गया। उसके साथ पुष्पक विमान, नौ माणिक का हार आदि भी दिए गए। इन्द्रदेव ने देते हुए यह भी कहा कि जब तक सदाचार रहेगा यह रहेंगे और अनीति होने पर मिट जाएंगे। धर्मसभा में आगममर्मज्ञ चेतनाश्रीजी म.सा. ने कहा कि प्रतिदिन सुबह उठते ही परमात्मा के नाम की माला अवश्य फेरे। माला दिन में किसी भी समय फेर सकते पर शुद्धिकरण व शक्ति रूपी जो लाभ सुबह प्राप्त होता वह अन्य समय नहीं रहता। उन्होंने ये भी बताया कि माला किस हाथ से फेरनी चाहिए और किस तरह फेरनी चाहिए ताकि वह अधिक लाभदायी हो सके। साध्वीश्री ने आसन का महत्व बताते हुए कहा कि हमारी कोई भी धर्म क्रिया हो आसन के बिना नहीं हो सकती। इसलिए सामायिक करे या माला फेरे आसन का अवश्य ध्यान रखे। महासाध्वी इन्दुप्रभाजी म.सा. ने बताया कि सोमवार को अष्टमी से पचरंगी एकासन की आराधना भी शुरू हो रही है। इसके तहत पांच-पांच श्राविकाओं द्वारा 5,4,3,2 एवं 1 एकासन किए जाएंगे। इस आराधना के तहत 25 श्राविकाओं द्वारा कुल 75 एकासन होंगे।
आत्मकल्याण की राह में सबसे बड़ी बाधा क्रोध
धर्मसभा में मधुर व्याख्यानी डॉ. दर्शनप्रभाजी म.सा. ने कहा कि कई जन्मोें की यात्रा के बाद मिलने वाला मनुष्य तन सबसे दुर्लभ माना जाता है क्योंकि इसी तन से मोक्ष जाने का मार्ग मिलता है। देवता बनकर भी मोक्ष नहीं जा सकते है। पापों का समूल नाश करने का साधना मनुष्य तन के रूप में मिला औदारिक शरीर है। शरीर को व्याधियों का मंदिर बताते हुए कहा कि कब कौनसी व्याधि हो जाए पता नहीं चलता। वेदना के समय परमात्मा व धर्म ही सहारा होते है। इसलिए धर्म से जुड़ आत्मकल्याण इस भव में ही कर ले। तत्वचिंतिका डॉ. समीक्षाप्रभाजी म.सा. सुखविपाक सूत्र का वाचन करते हुए कहा कि सुबाहूकुमार जैसा जीवन हमारा आदर्श होना चाहिए। बच्चों को योग्य बना नौकरी के पीछे भागने की बजाय उद्यमशील बन स्वयं का व्यवसाय करने की प्रेरणा दे। सुबह उठते ही सबसे पहले निरोगी रखने के लिए अपने शरीर को धन्यवाद दे ओर उसके बाद माता-पिता, देव, गुरू व धर्म को धन्यवाद दे। फिर जीवन जीने में जो सहयोगी है उनको भी धन्यवाद दे। धर्मसभा में आदर्श सेवाभावी दीप्तिप्रभाजी म.सा. एवं नवदीक्षिता हिरलप्रभाजी म.सा. का भी सानिध्य मिला। धर्मसभा में उपवास, आयम्बिल व एकासन तप के प्रत्याख्यान भी लिए गए। संचालन श्रीसंघ के मंत्री सुरेन्द्र चौरड़िया ने किया। रविवार को धर्मसभा में शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रावक-श्राविकाएं जिनवाणी श्रवण के लिए रूप रजत विहार में उमड़े। चातुर्मासिक नियमित प्रवचन प्रतिदिन सुबह 8.45 बजे से 10 बजे तक होंगे।
सुबह युवाओं के साथ हुई धर्मचर्चा एवं दोपहर में बाल संस्कार कक्षा
रूप रजत विहार में रविवार प्रातः 8 से 8.30 बजे तक युवाओं के साथ धमचर्चा का आयोजन किया गया। इसमें महासाध्वीवृन्द ने कहा कि युवाओं को अपना भविष्य धर्म की दृष्टि से सुरक्षित बनाने के लिए कुछ समय जिनवाणी श्रवण करने और धर्म साधना करने के लिए अवश्य निकालना चाहिए। उन्होंने युवाओं मन की जिज्ञासाओं का भी समाधान किया। इसी तरह रविवार दोपहर 1 से 2 बजे तक बाल संस्कार कक्षा का आयोजन किया गया। इसमें आदर्श सेवाभावी दीप्तिप्रभाजी म.सा. एवं नवदीक्षिता हिरलप्रभाजी म.सा. ने बच्चों को धर्म संस्कार प्रदान किए और उन्हें धर्म से किस तरह जुड़ना है इस बारे में समझाया। दोपहर 3 से 3.40 बजे तक प्रश्नमंच का आयोजन किया गया। इसमें भी कई श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लिया। श्री अरिहन्त विकास समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र सुकलेचा के अनुसार चातुर्मास के तहत प्रतिदिन सूर्योदय के समय प्रार्थना का आयोजन हो रहा है। प्रतिदिन दोपहर 2 से 3 बजे तक नवकार महामंत्र जाप एवं दोपहर 3 से 4 बजे तक साध्वीवृन्द के सानिध्य में धार्मिक चर्चा हो रही है।