रतलाम,26 जुलाई। संसार में कुछ मानव तन के उजलेे, तो कुछ मन के मेले है। कुछ मन के उजले, तो कुछ तन के मेले है। कुछ मानव तन और मन दोनो से मेले है, तो कुछ तन और मन दोनो उजले है। उजले मानव उत्कृष्ट कोटी के होते है। हमे उत्कृष्ट कोटी का बनना, तो गंदगी से बचना होगा। गंदगी के साथ प्रभु की बंदगी नहीं हो सकती है।
यह बात पूज्य प्रज्ञा निधि युगपुरूष आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि प्रभु की वाणी पतित को पावन और दानव को मानव बना देती है। इसे मन की बुद्धि के साथ श्रवण किया जाए, तो यह मानव को महामानव बना देती है। हमारा मन कभी भी मलीन नहीं हो और हमेशा क्लीन रहे, इसके लिए प्रभु ने एकमात्र उपाय साधना को बताया है। साधना तभी फलवती और बलवती होगी, जब उसमें दृढता, मधुरता, निर्मलता और सरलता होगी।
आचार्यश्री ने कहा कि साधना के मार्ग में चार बाधाएं कटटरता, कटुता, कलुषितता एवं कुटीलता आती है। कटटरता में व्यक्ति खुद को ही सच्चा और अच्छा कहता है। जबकि कटुता में वह अपनी मधुरता भूल जाता है। इससे कलुषितता और कुटीलता आती है, जो हमारे मूल स्वभाव को खत्म कर देती है। इनसे बचने के लिए कटटरता की जगह दृढता लाना चाहिए। दृढता होगी, तो अच्छाई खुद आ जाएगी।
आचार्यश्री ने कहा कि अच्छाई और सच्चाई किसी की बपौती नहीं, अपितु ये तो सार्वजनिक, सार्वकालिक और सार्वभोमिक है। आरंभ में उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने पानी से जुडे पापों पर प्रकाश डाला। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भी संबोधित किया। अंत में आदर्श संयमरत्न श्री विशालप्रिय मुनिजी मसा ने प्रवचनों पर आधारित रोचक प्रश्न किए गए।