जितना श्रम ज्यादा, उतना स्वास्थ्य अच्छा – आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

रतलाम, 27 जुलाई। गांव, गाय की तरह और शहर शेर की तरह होते है। गाय घांस को कभी जड़ से नहीं खाती लेकिन शेर शिकार को पूरा खा जाता है। गांव के लोगों में संवदेना ज्यादा होती है और शहर वालों में बुद्धि अधिक होती है। उम्र के 40 साल बाद अगर चले नहीं तो फिर नहीं चल सकोगे। जितना श्रम ज्यादा, उतना स्वास्थ्य अच्छा होता है।
यह उद्गार आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाॅकीज में गुरूवार को प्रवचन में कहे। उन्होने कहा कि साधना में भेद है, लेकिन भावना में कोई अंतर नहीं होता। संसार से मोहित नहीं होना चाहिए। इस जगत में कोई भी शाश्वत नहीं है। मैं कायम हूं लेकिन मेरे आस-पास कुछ भी कायम नहीं है। वियोग निश्चित है, चाहे किसी से भी मोह कर लो। यदि आपके द्वार पर रोटी के लिए एक कुत्ता भी न आए तो समझ लेना की आप बर्बादी की तरफ हो।
आचार्य श्री ने प्रभु के जीवन के तीन स्टेप- देशना, साधना और भावना को बताते हुए कहा कि परमात्मा की देशना शेर की दहाड़ जैसी है। देशना से पहले साधना होती है। इस जगत में अगर मेरी चले तो सभी जीवों को कोई दुःख न हो, सभी को तार दूं मन में यह भावना होना चाहिए।
आचार्य श्री ने तीन प्रकार की घड़ी टावर क्लाॅक, वाॅल क्लाॅक और रिस्ट वाॅच पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रिस्ट वाॅच यानी जो स्वयं के सुखी होने का सोचे। वाॅल क्लाॅक यानी परिवार के सुख के लिए सोचना और टावर क्लाॅक जो सभी की सोचे। जो सारे जगत की सोचे वह टावर क्लाॅक होती है।
श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के तत्वावधान में आयोजित प्रवचन के दौरान बढ़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।