प्रभु की आराधना फोर्स, फास्ट, फस्ट प्रायोरिटी, फैंटास्टिक और फ्रेब्यूलस होना चाहिए- मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा.

रतलाम, 7 अगस्त। आराधना करते है लेकिन कल्याण नहीं हो रहा, क्योंकि हम धर्म कर रहे है लेकिन धर्म क्रिया नहीं कर रहे है। हमें धर्म क्रिया में पांच ” एफ ” – फोर्स, फास्ट, फस्ट प्रायोरिटी, फैंटास्टिक और फ्रेब्यूलस को ऐड करना होगा। यदि यह पांच ” एफ ” हमारी आराधना मंे जुड़ जाए तो हमारी आराधना बेहतर हो जाएगी।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा के शिष्य मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाकीज में सोमवार को प्रवचन में कहीं। मुनिराज ने कहा कि हमारी प्रार्थना में फोर्स लाना है। यह हमें भाव पूर्वक करना है। बिना फोर्स के हमें इनाम नहीं मिलता है। पानी के अंदर भी हम अमृत का भाव डाले तो वह भी अमृत की तरह हमारे अंदर के जहर को खत्म कर देता है।
मुनिराज ने कहा कि दान, तप, शील, पूजा को भाव से करना चाहिए। तमाम क्रिया में यदि भाव की शकर एड करो तो आराधना का स्वाद बढ़ जाता है। भाव तीन प्रकार के आदर, आनंद और आराधना के होते है। प्रभु की आराधना आदर भाव से करना चाहिए। कोई भी अनुष्ठान करो उसके पहले हदय में आदर भाव होना चाहिए। आराधना करते हुए जो भी पाया है, उसमें आनंद का भाव होना चाहिए।
मुनिराज ने कहा कि ईश्वर की आराधना करने पर हमे जो मिला उसके लिए अनुमोदना का भाव रखना चाहिए। धर्म में आदर बढ़ाना है तो आनंद लाते जाओ। पाप के अंदर ताकत बढ़ानी है तो आंसू लाते जाओ। मोक्ष में जल्दी जाना है तो जो आराधना करो, वह फास्ट करो।
मुनिराज ने कहा कि हमारी फस्ट प्रायोरिटी में धर्म रहना चाहिए। धर्म को हम हमेशा लास्ट में रखते है। पेमेंट आज मिलता है तो पोस्टपोंड नहीं करते है, तो आराधना को क्यो करते है। प्रभु के जो भी अनुष्ठान करना हो वह फैंटास्टिक और आराधना फ्रेब्यूलस होना चाहिए। लोग देखकर दंग रह जाए कि क्या पाया है, ऐसी आराधना होना चाहिए।
श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमजैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के तत्वावधान में आयोजित प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्री संघ के पदाधिकारी एवं श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।