विलासिता में फिजूलखर्ची, आडंबर और विपन्नता-आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा

छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन

रतलाम,08 अगस्त। संसार मंे आज विलासिता बहुत बढ रही है और इसका कारण अज्ञान एवं अंधकार है। विलासिता फिजूल खर्ची बढाती है। व्यक्ति को आडंबर प्रिय बनाती है और आर्थिक विपन्नता का शिकार कर देती है। इससे बचने के लिए भोगी नहीं, त्यागी बनने का प्रयास करे।
यह आव्हान परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने किया है। छोटू भाई की बगीची में मंगलवार को चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान उन्होंने विलासिता को दुर्मति का नौंवा दोष बताया और कहा कि भोग ही व्यक्ति को विलासी बनाता है। मनुष्य का जीवन अनंतकाल की पुण्यवानी से मिलता है, इसे आत्मा के कल्याण में लगाना चाहिए। लेकिन अज्ञान और अंधकार के कारण मनुष्य भोग में लगा रहता है। उन्होंने कहा कि सांसारी लोग धन की प्राप्ति और मन की शांति चाहते है, वे मन की शांति के लिए धन प्राप्ति का मार्ग अपनाते है, लेकिन जब धन अधिक हो जाता है, तो उन्हंे पता चलता है कि इसमें मन की शांति नहीं है। इसके विपरीत साधक हमेशा ज्ञान की प्राप्ति और मन की शुद्धि का उपासक रहता है। क्यांेकि वह जानता है कि मन की शुद्धि होगी, तो शांति अपनेआप मिल जाएगी। मन की शुद्धि हमेशा ज्ञान से होती है। इसलिए हमे धन की प्राप्ति और मन की शांति पर नहीं, अपितु ज्ञान की प्राप्ति और मन की शुद्धि पर जोर देना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि विलासिता ज्ञान की प्राप्ति भी नहीं होने देती और मन को शुद्धि भी नहीं देती है। उल्टे ये मन को विकृत करती है। चूंकि जीवन की शुद्धि मन पर निर्भर है, इसलिए साधक हमेशा ज्ञान की प्राप्ति और मन की शुद्धि चाहते है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने भी संदेश दिया है-प्रमादी धन से कभी अपनी सुरक्षा नहीं कर सकता। उसकी सुरक्षा का एकमात्र माध्यम ज्ञान ही है। शास्त्रज्ञ कहते है कि संसार में वहीं भ्रमण करता है, तो भोग में रमण करता है। भोग छोडे बिना कोई संसार से मुक्त नहीं हो सकता। भोग की व्यर्थता जब व्यक्ति के समझ में आती है, तभी उसमें भोग के प्रति अरूचि का भाव पैदा होता है।
आचार्यश्री ने कहा कि सबकों मकसद से जीना और मतलब से जीना का फर्क समझना आवश्यक है। साधकों का मकसद त्यागी बनो, वैरागी बनो और फिर वितरागी बनो होता है। जबकि सांसारी व्यक्ति का जीवन मतलब का होता है। भोग से जुडे रहने वाले को कभी मकसद प्राप्त नहीं होता। प्रवचन के आरंभ में उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने इससे पूर्व आचारण सूत्र का वाचन किया। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भाव व्यक्त किए। महासती श्री निरूपणाश्रीजी मसा ने 28 उपवास और श्री नमनप्रिय जी मसा ने 8 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। कई श्रावक-श्राविकाओं का बैले-तेले, अठठाई आदि की तप आराधना की। श्री संघ ने सभी तपस्वियों का बहुमान किया।