विलासिता अमीरी का अभिशाप, सादगी संयम का पर्याय -आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा

छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन

रतलाम,10 अगस्त। जीवन शैली दो तरह की होती है-एक सादगी भरी और दूसरी विलासिता भरी। पहले लोग कहते थे खाओ-पियो और प्रभु का भजन करो, लेकिन आज लोग कहते है-खाओ-पियो और ऐश करो। ऐश-आराम की ये जिदंगी मनुष्य नकलची बनकर जी रहा है। मनुष्य को ये अनुकरणशीलता ही विलासी बनाती है। इसमें चेहरा बुझा सा और चाल थकीमांदी हो जाती है। विलासिता में जीने वालों को बचपन में ही बुढापा आ जाता है। विलासिता अमीरी का अभिशाप है, तो सादगी संयम का पर्याय है।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान कही। दुर्मती के दोषों का विवेचन कर रहे आचार्यश्री ने विलासिता से बचने का आव्हान करते हुए सादगी से जीवन जीने का आव्हान किया। उन्होंने कहा कि संतोषी लोग सादगी भरा जीवन जीते है, जबकि असंतोषी को विलासिता रास आती है। सादगी से जो जीते है, वे इच्छाजीवी नहीं, अपितु इच्छाजयी होते है। विलासिता में जीने वाले आराम से जीते भी नहीं और आराम से मर भी नहीं पाते है। उन्हें कहीं भी शांति, संतोष और संयम नहीं रहता। ऐसे लोग तंगी का जीवन जीते है और विलासिता की झूठी सोच उन्हें तन ही नहीं मन से भी विपन्न बना देती हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि आधुनिकता विचारों मंे हो, तो बुरी नहीं होती, लेकिन ये जब व्यवहार, आचार और संस्कार में आ जाती है, तो मनुष्य को विलासी बना देती है। इसमें व्यक्ति सदैव असंतुष्ट ही रहता है। सादगी में यदि स्वतंत्रता है, तो विलासिता में परतंत्र हो जाते हैं। साधु-संत सादगीपूर्ण जीवन के कारण सबकों अच्छे लगते है। ज्ञानियों ने कहा कि विलासिता में जीवन का लक्ष्य विस्मृत हो जाता है। इसलिए सबकों इससे बचने का प्रयास करना चाहिए। विलासिता का दंश कोरोना से भी अधिक खतरनाक है। संकल्पशक्ति से ही व्यक्ति इससे दूर रह सकता है।
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन का सत्य संयम, संतोष और धर्म है। आचार्य तुलसी ने अपनी पुस्तक एक बूंद, एक सागर में लिखा है विलासी व्यक्ति ना संयत रहता है, ना स्थिर रहता है और ना ही जीवन के सत्य का समझ पाता है। जीवन के सत्य को पाना है, तो सादगी ही सार है। आरंभ में उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारण सूत्र का वाचन करते हुए संसार और आध्यात्म में अंतर पर प्रकाश डाला। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भी भाव व्यक्त किए। प्रवचन के दौरान बडी संख्या में श्रावक-श्राविकागण मौजूद रहे।