तलेगांव में हृदय स्पर्शी 18 पाप स्थानक शिविर सम्पन्न

तलेगांव। परोपकार सम्राट श्री मोहनखेडा़ तीर्थ विकास प्रेरक आचार्यदेव श्रीमद्विजय ऋषभचंद्र सूरीश्वरजी महाराजा साहेब के आज्ञानुवर्ति सुशिष्य पंचम वर्षीतप तपस्वीरत्न मुनिप्रवर श्री पीयूषचंद्र विजयजी म.सा.मुनिप्रवर श्री रजतचंद्र विजयजी म.सा.मुनिश्री प्रीतियश विजयजी मसा आदि ठाणा 3 की पावन निश्रा में Sunday special shivir मारा पापों नू प्रक्षालन करजों विषय पर हृदय स्पर्शी शानदार शिविर आयोजित किया गया। शिविर एवं शिविर पश्चात सकल श्रीसंघ की स्वभक्ति का आयोजन दिलीप जी पारीख के 68वें जन्मदिवस उपलक्ष में किया गया।
पू.मुनिश्री रजतचंद्र विजयजी म.सा.की प्रभावशाली शौली में 04 घंटे तक चला धारा प्रवाह शिविर । लाभार्थी दिलीपजी पारीख के 68 वें जन्मदिवस निमित्ते भव्यतम शिविर का आयोजन किया गया । 18 पाप स्थानक का विवेचन सुनकर लोग अभिभूत हुए । 18 पाप स्थानक की स्तुति एवं गीत ने सभी को आत्म चिंतन करने पर बाध्य किया ।
आज के कार्यक्रम में मध्यप्रदेश के पधारे बंधु बेलड़ी के माताजी श्रीमती पारसमणी देवी महेंद्रकुमारजी भंडारी राजगढ़ का एवं ममता बेन एवं रानी बेन व परिजनों का बहुमान चातुर्मास के मुख्य लाभार्थी श्रीमती अनीताबेन रविंद्र कुमारजी सोलंकी परिवार द्वारा किया गया।
श्रीसंघ की ओर से दिलीपजी पारेख परिवार का बहुमान भी सोलंकी परिवार ने किया। कार्यक्रम के अंत में श्री गौतम स्वामीजी की आरती व दादा गुरुदेव श्री राजेंद्रसुरीजी की आरती लाभार्थी परिवार द्वारा कि गई । कार्यक्रम पश्चात् पारेख परिवार की ओर से संघ पूजन एवं स्वामीभक्ति का आयोजन किया गया। दिलीपजी पारेख को जन्मदिन की संगीतमय बधाई मुंबई से पधारे संगीतकार भरतभाई ओसवाल ने दी । वामा महिला मंडल तलेगांव ने 18 पाप स्थानक की थीम पर आकर्षक रांगोली बनाई जिसकी सभी ने तहेदिल से जबरदस्त सराहना की। 18 पाप स्थानक चित्र के दर्शन भी कराये गयें।
ये हैं 18 पाप स्थानक
( 1) प्राणातिपात- हिंसा करना,किसी भी जीव के प्राणों का घात करना,पीड़ा देना,मानसिक त्रास देना वो द्रव्य हिंसा है। रागादि भाव के साथ घात करना वो भाव हिंसा है
(2) मृषावाद- असत्य बोलना। धन-धान्य के व परिवार के लाभ या लोभ के कारण असत्य वचन बोलना, झूठी साक्षी देना
(3) अदत्तादान- चोरी से छुपा के लेना,पूछे बिना लेना,राज्य के कर आदि छुपाना वो भी चोरी है। एक परमाणु जितना भी चोरी करना अदत्तादान है।
(4) मैथुन- विषयभोग,काम वासना,इंद्रियों का असंयम,पांचों ही इंद्रियों के भोगों की लोलुपता
(5) परिग्रह- धन धान्यादि संग्रह करके उसमें मान ममत्व करना,आवश्यकता से भी ज्यादा मिलने की तृष्णा फैदा करना।
(6) क्रोध- गुस्सा,आवेश,आक्रोश,अनादर करना।
(7) मान- अहंकार,अभिमान और आठ प्रकार के मद..जाती कुल बल मान तप ज्ञान रूप ऐश्वर्य आदि का अहंकार करना।
(8) माया- छल कपट प्रपंच मलिनता करना
(9) लोभ- तृष्णा,असंतोष लालच करना। लोभ दोष को पापों का बाप माना जाता है। (10) राग- मोह,ममता आशक्ति और गारव बंधन का कारण है।
(11) द्वेष ईर्षा करना वैर का बंध करना।
(12) कलह- झगड़े-कंकास करना।
(13) अभ्याख्यान- किसी पर गलत आरोप करना
(14) पेशुन्य चुगली करना
(15) रति-अरती सुख में लिन बनना,दुख में दीन बनना
(16) परपरिवाद दूसरों की निंदा करना स्वयं की प्रशंसा करना
(17) माया मृषावाद माया से असत्य वचन बोलना ।
(18) मिथ्यात्वशल्य विपरीत बुद्धि वो शल्य माना जाता है जिनमत पर अश्रद्धा करना।

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