छोटू भाई की बगीची में प्रवचन
रतलाम,21 अक्टूबर। मनुष्य जीवन में भावनाओं को बडा महत्व है। भावना में शुद्धता रहेगी, तो भविष्य उज्जवल हो जाएगा और भावना में मलीनता आई, तो भविष्य खराब हो जाएगा। भावना सही रखो और धर्म आराधना करो, जिससे जीवन सार्थक हो जाए।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। छोटू भाई की बगीची में आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन में उन्होंने कहा कि भावना के दो प्रकार संकुचित और उददात है। उददात भावना व्यक्ति को उदार बनाती है और उदार भावना वाला अपनी भावना में कभी छेद नहीं रखता। जिसकी भावना में छेद नहीं होता, उसकी साधना में खेद नहीं होता और उसके वात्सल्य में विभेद भी नहीं होता।
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन को सार्थकता देनी हो, तो अपनी भावना, साधना और वात्सल्य में एकरूपता रखना चाहिए। एकरूपता उददात भावना से ही आएगी। आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी मसा ने दोष दृष्टि रखने के बजाए गुण दृष्टि रखने की सीख दी। उन्होंने दोनो दृष्टियों के अलग-अलग परिणामों की व्याख्या की।
इस मौके पर दिल्ली से आए राजेश जैन ने आचार्यश्री से अपने जीवन काल में 500 पौषध करने का संकल्प ग्रहण किया। कई तपस्वियों ने अलग-अलग तपस्या के प्रत्याख्यान लिए। प्रवचन के दौरान बडी संख्या में श्रावक-श्राविकागण उपस्थित रहे।