जोधपुर । हिंदी भाषा भारत माता के सुहाग की बिंदी और सिंदूर के समान है भाषा का स्वाभिमान ही राष्ट्र का स्वाभिमान है उक्त विचार राष्ट्र संत कमलमुनि कमलेश ने अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस पर महावीर भवन निमाज की हवेली ने संबोधित करते कहा कि इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है हिंदी की रक्षा के लिए जूझना पड़ रहा है हिंदी भाषी क्षेत्र में ही हिंदी दिवस मनाने को मजबूर होना पड़ रहा है हिंदी और उर्दू दोनों आपस में बहने हैं । जैन संत ने कहा कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में ही सौतेला व्यवहार किया जा रहा है हिंदी बोलने में शर्म महसूस करते हैं बोलने वाले को दकियानूसी बोलते हैं और टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने में अपना गौरव महसूस करते हैं । राष्ट्रसंत स्पष्ट कहा कि अंग्रेज चले गए लेकिन आज भी उनकी मानसिकता का गुलाम है हिंदी दिवस मनाना औपचारिकता मात्र बनकर रह गई है यदि सरकार हिंदी के प्रति गंभीर है तो शासकीय कार्यालयों में सभी काम हिंदी में चालू क्यों नहीं कर देती।
उन्होंने कहा कि हिमेरा अनुरोध है वह कम से कम एक गाड़ी का प्लेट नंबर नाम के प्लेट नंबर और बोली चाली की भाषा में 365 देनी हिंदी का प्रयोग करने का संकल्प लें और समय उनको हिंदी का प्रयोग करने से कौन रोक रहा है।
मुनि कमलेश ने कहा कि राष्ट्रीय एकता में हिंदी भाषा का ऑक्सीजन से भी महत्वपूर्ण योगदान है किसी भी प्रांत के व्यक्ति को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार राजनीति कोई भी काम करना है तो हिंदी उसके विकास का पायदान होगा विश्व स्तरीय भाषा अपने आप बन जाएगी इसकी उपयोगिता से । अंत में कहा कि प्रांतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय भाषा को महत्व देना चाहिए आश्चर्य होता है दक्षिण क्षेत्र में अंग्रेजी से प्यार करते हैं और राष्ट्रीय भाषा से नफरत या कौन सी राष्ट्रीयता है उनकी आवश्यकता होने पर अंग्रेजी का प्रयोग करें लेकिन हिंदी के स्वाभिमान को न भूलें।
दक्षिण प्रांत में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अखिल भारतीय जैन दिवाकर विचार मंच ने दिल्ली की ओर से राष्ट्र संत कमलमुनि कमलेश पत्रकारिता और हिंदी साहित्य कवि तीन अवार्ड 2001 से प्रारंभ किए हैं काफी सफलता मिली है अरिहंत मुनि कौशल मुनि अक्षत मुनि ने विचार व्यक्त किए घनश्याम मुनि ने मंगलाचरण किया।