ध्यान मन से संबंधित है और कायोत्सर्ग काया से संबंधित है

कायोत्सर्ग करने के पांच उद्देश्य उन्तरीकरण, प्रायश्चित आदि फरमाए है

जावरा (अभय सुराणा)। कायोत्सर्ग की विधि एवं लाभ बताते हुए उसके अभ्यास की प्रेरणा पंडित रत्न श्री धर्मेंद्र मुनि जी म. सा. के सू -शिष्य श्री प्रशस्त मुनि जी ने जैन दिवाकर भवन दिवाकर मार्ग पर फरमाया धर्म सभा को संबोधित करते हुए जिन शासन गौरव पूज्य गुरुदेव उमेश मुनि जी महारा साहब के सुशिष्य पूज्य श्री धर्मेंद्र मुनि जी म .सा.ने फरमाया कि सुख-दुख का वेदन आत्मा युक्त शरीर करता है, केवल आत्मा या शरीर नहीं करता है। परिग्रह की हेयता समझाकर पहले मनोरथ का नित्य चिंतन करने की प्रेरणा दी। मरण के भय को दूर करने के लिए समझाया की मरण मात्र आत्मा का शरीर को छोड़ना है जैसे कोई व्यक्ति मकान छोड़कर चला जाता है जैन तभी बनते हैं जब यह विश्वास हो कि सभी पापों के त्याग के बिना कर्मों से मुक्ति संभव नहीं है आज की प्रभावना श्रीमती सूरज बाई भैरूलाल जी टुकडिया एवं श्रीमती सुशीला बाई बाबूलाल जी कोलन परिवार द्वारा वितरित की गई धर्म सभा का संचालन श्री संघ के पूर्व महामंत्री सुभाष टुकडिया ने किया।

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