जावरा (अभय सुराणा )। संसार में जीव सुख के लिए तरसता है सुखी होने के लिए धन इकट्ठा करता है, उसके लिए कई दुःख भी उठाता है, जैसे दुकान पर खड़ा रहना, बाॅस की डांट सुनना परंतु मन में उनसे सुख मान लिया है जो कि वास्तविक सुख नहीं है। पूर्व ,पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि दिशाओं में घूमने वाला वो मैं हूं जीव को जानने के लिए अन्य कहीं देखने की जरूरत नहीं है। क्योंकि मैं ही तो वह जीव हूं जो जीव आत्मा का सामर्थ्य पहचान जाता है। वह साधना का उत्कृष्ट पुरुषार्थ कर सकता है। यह प्रेरक प्रवचन रवि मुनि जी महारा साहब ने जैन दिवाकर भवन पर फरमाया धर्म सभा को संबोधित करते हुए जिन शासन गौरव पूज्य गुरुदेव उमेश मुनि जी म. सा. के सुशिष्य पूज्य श्री धर्मेंद्र मुनि जी म .सा.ने फरमाया जैन दिवाकर पूज्य श्री चौथमल जी महारा साहब द्वारा रचित स्तवन ^ ले संग खर्ची रे… पर विवेचन करते हुए बताया कि धर्म बिना पर भव में सुख नहीं मिल सकता है। परिग्रह को आग और काला नाग मानकर उसे कम करना संपूर्ण त्याग की भावना करना यही श्रावक का दूसरा मनोरथ है। जैन वही है जिसे जिन बनने की भावना हो अर्थात वैराग्य भावना हो। आज की प्रभावना श्रीमती सुशीला बाई बाबूलाल जी कोलन परिवार द्वारा वितरित की गई। धर्म सभा का संचालन श्री संघ के महामंत्री महावीर छाजेड़ और जानकारी सुभाष टुकड़िया ने दी।