फसल व पशुओं के बचाव हेतु सबलगढ़ में प्रशिक्षण आयोजित

खेतों में नमी बनाए रखना आवश्यक

पिपलौदा (प्रफुल जैन )। बदलते मौसम से फसलो और पशुओं के बचाव हेतु कृषि विज्ञान केंद्र कालुखेडा द्वारा ग्राम सबलगढ़ में किसानों को एक दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण में कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ.सर्वेश त्रिपाठी ने किसानो को इस बदलते मौसम में वैरायटी की फसलो के बीजो का चुनाव करने की सलाह दी ताकि बदलते मौसम में उसके उत्पादन पर प्रभाव ना पड़े जिससे किसानो को आर्थिक हानि ना हो साथ ही उन्होंने बताया कि बदल रहे मौसम और दिन के समय ठंड में कमी होने से गेहूं फसल पर असर पड़ सकता है नमी की कमी से गेहूं फसल के डंठल की वृद्धि प्रभावित हो सकती है इसका प्रभाव उपज पर पड़ सकता है। इसके लिए खेतों में नमी बनाए रखना आवश्यक है। खेतों की मिट्टी को सूखने नहीं दें और हमेशा नमी बनाए रखे। इससे गेहूं की फसल अच्छी और ज्यादा उपज देने वाली होगी। सिंचाई के बाद हर बार खाद डालना उपयुक्त नहीं है। किसान रासायनिक खाद का प्रयोग कम से कम करें।

शारीरिक संरचना के लिए प्रोटीन जरुरी

पशुपालन विशेषज्ञ डॉ. सुशील कुमार ने बताया की बदलते मौसम में किसान पशु-पालकों को अपने पशुओं का विशेष ध्यान रखना पड़ता है क्योकि पशुपालन में पशुओं के साथ ही कार्बोहाइड्रेट की अहम भूमिका होती है| जोकि पशुओ के चारे में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है| यह अधिकतर गेहूं के भूसे, अनाज के दाने के रेशों में तथा ज्वार, बाजरा व मक्का की कड़वी में भरपूर पाया जाता है। शारीरिक संरचना के लिए प्रोटीन जरुरी होता है जो पशु की शारीरिक संरचना के लिए महत्वपूर्ण व आवश्यक तत्व है यह शरीर की वृध्दि के साथ-साथ, गर्भ में पल रहे शिशु के लिए अति आवश्यक होता है प्रोटीन मुख्य रूप से अनाज और खलियों में तथा दलहनी हरे चारे जैसे की लोबिया,ग्वार, रिजका एवं बरसीम में भरपूर मात्रा में पाया जाता है वही दूध उत्पादन में भी प्रोटीन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है इसलिए पशुपालक किसान अपने पशुओं को बरसीम, लूसर्न, ग्वार एवं लोबिया आदि को हरे चारे के रूप में एवं दाल चूरी, कोरमा तथा खल आदि को दाने के रूप में खिलाएं। प्रशिक्षण में लगभग 25 किसान ने सहभागिता की जिनका पंजियन आदित्य प्रताप सिंह राठौर ने किया।

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