सल्लेखनारत पंडित रतनलाल जी आज से आत्मानंद सागर कहलायेंगे

इंदौर (राजेश जैन दद्दू )। देश के मूर्धन्य जैन विद्वान, चारों अनुयोगों के सर्वमान्य ज्ञाता एवं आगम मनीषी पंडित रतनलाल जी शास्त्री (90 वर्ष ) की सल्लेखना समोशरण मंदिर कंचन बाग में पूर्ण चेतन अवस्था में संतोष एवं शांत परिणामों के साथ दृढ़ता पूर्वक चल रही है और उनके परिणामों में विशुद्धी बढ़ती जा रही है।
नवम प्रतिमा धारी पंडित जी ने कुंडलपुर में विराजित आचार्य समय सागर जी से आज जल के त्याग की एवं एवं अपनी समाधि अच्छे से होने की भावना(इच्छा) का संदेश भेजकर आशीर्वाद मांगा और आचार्य श्री ने भी पंडित जी की भावना और परिणामों में विशुद्धी और दृढ़ता को ध्यान में रखकर उन्हें आशीर्वाद भेजते हुए उनका नाम पंडित रतनलाल जी के स्थान पर आत्मानंद सागर घोषित किया। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आत्मानंद सागर जी की सल्लेखना उदासीन आश्रम के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी अनिल भैया जी के मार्गदर्शन में आश्रम के सभी ब्रह्मचारी भाइयों के सहयोग से धर्म ध्यान के साथ सानंद चल रही है।

क्या है सल्लेखना समाधि मरण? – डॉ जैनेंद्र जैन

जैन शास्त्रों में सल्लेखना पूर्वक होने वाली मृत्यु को समाधि मरण, पंडित मरण, अथवा संथारा भी कहा जाता है जिसका अर्थ जीवन के अंतिम समय में तप विशेष की आराधना है जिसके आधार पर साधक मृत्यु की समीपता मानकर चारों प्रकार के आहार और क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय एवं अपने परी के प्रति मोह ममत्व का त्याग कर निराकुल भाव से परमात्मा का चिंतन करते
हुए मृत्यु का वरण करता है। सल्लेखना समाधि पूर्वक मृत्यु का वरण करना ही मृत्यु महोत्सव है।
सल्लेखना व्रत अंगीकार करने वाले के जीवन में लोकेषणा और सुखेषणा की लालसा खत्म हो जाती है और वह अपनी आत्मिक शक्ति को पहचान कर प्रभु परमात्मा के चिंतन में अनवरत लीन रहते हुए एवं आध्यात्मिक विकास की साधना करते हुए निराकुल भाव से अपने मरण को मांगलिक बना लेता है।