पुण्य व पुरुषार्थ से ही मोक्ष का मार्ग संभव – मुनि श्री सद्भाव सागर जी म.सा.

रतलाम 10 अगस्त । श्रुति संवर्धन वर्षा योग 2025,श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर स्टेशन रोड, रतलाम आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी म. सा. के शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी म.सा. एवं क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा चंद्रप्रभा मंदिर मे पाट पर विराजित है।
प. पू. मुनि श्री 108 श्री सद्भाव सागर जी मसा ने अपने दिव्य प्रवचन में कहा कि जब जीव के श्रेष्ठ कार्य करने के परिणाम होते हैं। संसार में योग को संभालना इतना कठिन नहीं है जितना उपयोग को संभालना क्योंकि दुरुपयोग कोई भी कर लेता है सदुपयोग करने की बुद्धि नहीं चल पाती। जितना शुद्ध उपयोग को प्राप्त होगा,उतना ही जीव मोक्ष मार्ग की ओर गतिशील होगा।राम उपयोग की शुद्धता के कारण आत्माराम को प्राप्त हुए हैं। वह भी आनंद है जीवन अलग-अलग है जीव अलग-अलग है दोनों में अंतर है जीवन 100 वर्ष का हो सकता है परंतु जीव अलग है। जीव का कष्ट का समय कम है और आनंद का समय अधिक क्योंकि जीव एक बार भगवान बन जाए तो दीर्घकाल के लिए आनंद प्राप्त करता है, इसलिए आनंद का समय अधिक है एक बार सिद्ध बनने के बाद उसका आनंद हमेशा रहेगा, सुख हमेशा रहेगा, शक्ति हमेशा रहेगी, ज्ञान हमेशा रहेगा, अनंतानंत सुख अधिक है। भगवान बनोगे तो तुम्हारा आनंद कभी काम नहीं रहेगा।भगवान बनने का पुरुषार्थ हमेशा करना चाहिए।जिन्हें संसार अल्प करना है तो पुरुषार्थ अधिक करना पड़ेगा। मोक्ष के लिए धर्म और पुरुषार्थ को बढ़ाना पड़ेगा वर्तमान को मत देखो भविष्य को भी देखो जो दिखता है वही प्रमाणिक नहीं है नहीं है उसके आगे भी है।
पुण्य भी प्रतिफल जब होता है, जब राग मंद होता है,मोह में अल्पता आती है और वैराग्य के भाव सहज ही प्राप्त होने लगते हैं। जितने अंश में कषाय, राग, मोह मंद होंगे तो संसार के विषय भी अच्छे नहीं लगते है। यह सब मुनि बनने की क्रिया है मुनि दशा की अनुभचति तब आएगी जब आप मुनि बनोगे महामुनियों की कथा सुनना सुनाना कठिन नहीं है परन्तु कई जन्मों के पुण्य इकट्ठा करना और जैन मुद्रा धारण करना कठिन है क्योंकि विषयासक्ति को छोड़ना पड़ता है और मनुष्य गुण और दोष में भेद नहीं कर पाता है। प्रबुद्ध शक्ति में जीना है, तो आसक्ति को छोड़ना पड़ेगा। घर में रहकर भी धर्म किया जा सकता है पुण्य किया जा सकता है परंतु वे महान जिन्होंने घर छोड़कर महापुण्य, महा ज्ञान प्राप्त किया है आप सब लोग यह निश्चित करें कि हम रतलाम को संस्कारवान बनाएंगे।संसार में सबसे दुर्लभ वस्तु जो आसानी से मिल सकती है वह पुण्य है पुण्य के प्रताप से अल्प से अल्प वस्तु सरलता से प्राप्त हो जाती है बिना पुरुषार्थ के धन नहीं मिल सकता तो मोक्ष कैसे मिल सकता है इसलिए जीवन में पुरुषार्थ आवश्यक है परंतु उसका उपयोग सही तरीके से किया जाए तो वह मोक्ष मार्ग की ओर गतिशील कर देगा, देवत्व की ओर गतिशील कर देगा। हर जीव धर्म का कार्य अपने अनुसार करता है ज्ञानी शास्त्रों से ही नहीं सिखाते वह प्रतिदिन जो हो रहा है उससे भी सिखाते है। उक्त व्याख्यान प्रवचन श्रृंखला में दिये। व्याख्यान माला में समाज जैन बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।उक्त जानकारी श्री चन्द्रप्रभ दिगम्बर जैन श्रावक संघ रतलाम के संयोजक मांगीलाल जैन ने दी।