
तरुणसागर तीर्थ/कोडरमा। तरुणसागर तीर्थ में अपने वर्षायोग में अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महामुनिराज ने अपने भक्तों को सम्बोधन में कहा कि संसार में कोई कार्य असम्भव नहीं है.. किसी के होने ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई भी कार्य, कोई भी कर सकता है, और किया भी है लोगों ने.. बस इसके बीच का सफर खूबसूरत, मनभावन, मीठी यादों से भरा और प्रेरणास्पद होना चाहिए।
ये सच है – सबको सब कुछ नहीं मिलता। और सभी के जीवन में कुछ अच्छा तो कुछ बुरा अनुभव जरूर जुड़ा होता है। एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि सुख, आनंद, हँसी, खुशी को दुःख, परेशानी, अशान्ति और आंसुओं से ज्यादा रखने की कोशिश करते रहना चाहिए। कभी भी आंसुओं और दुःख को मन पर हावी नहीं होने देना चाहिए।
ये भी सच है – आप सबको खुश नहीं कर सकते। पड़ौसी को खुश रखने से ज्यादा कठिन काम है अपनों को खुश रखना। आप और आपके कार्यों से दुनिया खुश हो सकती है लेकिन आपके अपने कभी खुश नहीं हो सकते। इसलिए निन्दा, आलोचना, अपनों की छोठी, ओछी बातों को, अपने अन्तःकरण और मन की भूमि पर ना जमने दें। आप अपने कार्य को अपनी मस्ती, आनंद, उत्साह और जुनून के साथ करें और करते रहें। गुस्सा, द्वेष, ईर्ष्या को मन के आंगन में प्रवेश ना होने दें। अपने कार्य और कर्तव्य के प्रति जागरूक रहें। अपने कार्य की दिशा और लक्ष्य की ओर वर्धमान रहें। बस यही जीवन जीने के सूत्र हैं , और सम्यक समीचीन तरीका भी। अन्यथा आज के अपने लोग
ना जीने देंगे ना मरने देंगे,
ना कुछ करेंगे ना करने देंगे,
ना खायेंगे ना खाने देंगे,
ना चलेंगे ना चलने देंगे,
ना आयेंगे ना आने देंगे,
ना रहेंगे ना रहने देंगे..!
उक्त जानकारी जैन राज कुमार अजमेरा,जैन मनीष सेठी ने दी।