लेखक: पंकज व्यास
आज की दुनिया ‘इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन’ और डिजिटल शोर के बीच सिमट गई है। सुबह की पहली किरण से लेकर रात के अंधेरे तक, हमारा जीवन स्मार्टफोन की स्क्रीन और अंगूठे की ‘स्क्रॉलिंग’ के बीच फंसा हुआ है। तकनीक ने हमें दुनिया से तो जोड़ दिया, पर सवाल यह है कि क्या हम खुद से नहीं कट गए?
जब सब कुछ मशीनी होता जा रहा है, तब कला और साहित्य ही वे सेतु हैं जो हमें फिर से एक संवेदनशील इंसान बना सकते हैं। आइए जानते हैं क्यों:
- साहित्य: खुद से रूबरू होने का आईना
अक्सर युवाओं को लगता है कि साहित्य पुरानी पीढ़ी की चीज़ है। पर असल में, साहित्य वह इमोशनल जीपीएस है जो हमें खुद को ढूंढने में मदद करता है।
- साझा संघर्ष: जब आप कोई महान कहानी या कविता पढ़ते हैं, तो आपको एहसास होता है कि आपके सपने, आपके दुख और आपकी उलझनें सिर्फ आपकी नहीं हैं। सदियों से इंसान इन्हीं दौर से गुजरा है।
- अकेलेपन का इलाज: किताबें आपको यह भरोसा दिलाती हैं कि आप इस सफर में अकेले नहीं हैं। यह एहसास मानसिक शांति और परिपक्वता (Maturity) देता है।
- रचनात्मकता: करियर का नया ‘एक्स-फैक्टर’
आज के दौर में कला का मतलब सिर्फ पेंटिंग या गाना नहीं है, बल्कि यह ‘आउट-ऑफ-द-बॉक्स’ सोचने की क्षमता है।
- समस्या समाधान (Problem Solving): चाहे आप कोडर हों या डॉक्टर, एक कलात्मक नजरिया आपको जटिल समस्याओं के ऐसे समाधान खोजने में मदद करता है जो मशीनें नहीं सोच सकतीं।
- यूनिक पहचान: इस भयंकर प्रतिस्पर्धा में आपकी डिग्री नहीं, बल्कि आपकी क्रिएटिविटी आपको भीड़ से अलग और बेहतर बनाती है।
- ‘कंज्यूमर’ से ‘क्रिएटर’ तक का सफर
सोशल मीडिया ने हमें केवल ‘कंटेंट कंज्यूमर’ बना दिया है। हम दूसरों की बनाई रील्स देखने में इतने व्यस्त हैं कि अपनी मौलिकता भूलते जा रहे हैं।
- साहित्य हमें गहराई से सोचना सिखाता है, न कि केवल सतह पर तैरना।
- यह हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति (Empathy) रखना सिखाता है, जो एक बेहतर समाज के लिए अनिवार्य है।
- यह हमें रील्स देखने वाले दर्शक से बदलकर कुछ नया रचने वाला ‘सर्जक’ बनने की प्रेरणा देता है।
- आर्ट एज़ अ थेरेपी (Art as Therapy)
युवा होने का मतलब सिर्फ डिग्री और पैकेज की रेस नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य आज की सबसे बड़ी चुनौती है और कला इसका सबसे सरल समाधान है।
: रोज कम से कम 15 मिनट कुछ पढ़ें या कोई भी रचनात्मक काम करें—चाहे वह फोटोग्राफी हो, डायरी लिखना हो या संगीत। यह आपके दिमाग के लिए किसी ‘मैडिटेशन’ से कम नहीं है।
तकनीक और संवेदना का मेल
विज्ञान और तकनीक हमें रफ्तार दे सकते हैं, लेकिन जीवन की सार्थकता और संवेदनाएं हमें कला और साहित्य से ही मिलती हैं। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम डिजिटल आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक और रचनात्मक विरासत का संतुलन बनाए रखें।