


जयपुर/कोडरमा। पहली बार हुआ ‘हर माह एक उपवास’ कार्यक्रम, जैन संतों की मौजूदगी में युवाओं ने लिया महीने में एक दिन व्रत रखने का संकल्प जयपुर शहर में पहली बार ‘हर माह एक उपवास’ कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें जैन संतों के सान्निध्य में करीब 2 लाख लोगों ने प्रत्येक माह एक दिन उपवास रखने का संकल्प लिया। यह आयोजन शनिवार को जवाहर सर्किल स्थित एंटरटेनमेंट पैराडाइज में अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर के सानिध्य में संपन्न हुआ। देश का दूसरा और जयपुर में पहली बार हुए इस सामूहिक उपवास समारोह में राज्यपाल हरिभाऊ बागडे और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा विशेष अतिथि थे।
समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में संतों और मुनियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जैन मुनि कठोर तपस्या और संयम के माध्यम से समाज को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करते हैं तथा लोगों को सही जीवन-पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज का जयपुर आगमन सभी के लिए सौभाग्य का विषय है। इस अवसर पर आचार्य ने मुख्यमंत्री को अपनी पुस्तक ‘दिव्य मंगल भक्ति पाठ’ भेंट की।
कार्यक्रम में जैन मुनि-साध्वियों के साथ बड़ी संख्या में साधक, श्रद्धालु और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। आयोजन समिति के अध्यक्ष राजीव जैन (गाजियाबाद), महामंत्री आलोक जैन, मनीष बैद, समिति सदस्य राजेश रांवका, विनय सौगानी औरआशीष चेतन जैन ने संकल्प दोहराते हुए आत्मसंयम और साधना की इस ऐतिहासिक यात्रा को जन-जन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा। गुड़गांव में पहला सामूहिक उपवास आचार्य प्रसन्न सागर ने ही ‘हर माह एक उपवास’ श्रृंखला का शुभारंभ नई दिल्ली के भारत मंडपम से किया था, जिसके बाद गुड़गांव (हरियाणा) में प्रथम सामूहिक उपवास कार्यक्रम आयोजित हुआ। जयपुर में यह अपने तरह का पहला आयोजन है। कार्यक्रम में देशभर से साधक, साहित्यकार, समाजसेवी एवं कवि एकत्र हुए और उपवास, योग तथा साधना के महत्व पर विचार साझा किए। आचार्य प्रसन्न सागर ने कहा कि तेजी से भागती दुनिया में तनाव और असंतुलन जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं। प्रत्येक माह एक दिन उपवास की पहल व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा के संतुलन की दिशा में प्रभावी सिद्ध होगी।
अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर के मुताबिक उपवास शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। उप यानि पास- वास यानि रहना। उपवास यानि अपने पास रहना। आत्मा के निकट वास करना यानि रहना। भोजन की चिन्ता से मुक्त होकर जो समय बचता है, है, उसे जप तप ध्यान और स्वाध्याय में लगाना ही उपवास की सार्थकता है। यह आत्मा के गुणों के साक्षात्कार का एक सफल मार्ग है।
उपवास केवल पेट खाली रखने का नाम नहीं है, बल्कि कुविचार से दूर रहने और सात्विक जीवन जीने के संकल्प का नाम है। यदि उपवास के दरम्यान मन में क्रोध या ईर्ष्या बनी रहे, तो वह केवल लंघन कहलाता है, उपवास नहीं.. उपवास वह वैद्य है जो तन और मन को निरोगी बना देता है। उपवास वह सारथी है जो आत्मा रुपी रथ के इन्द्रिय और मन रूपी घोड़ो को वश में रखता है। उपवास वह सेतु है जो आत्मा और परमात्मा के बीच के अन्तर को समाप्त कर देता है।उपवास वह हंसा है जो आत्मा और शरीर के बीच नीर-क्षीरवत भेद-विज्ञान कराकर दोनों को अलग-अलग कर देता है। उपवास वह पैनी छैनी है जो कर्म पटलों को छांटकर आत्मा को। परमात्मा बना देता है। उक्त जानकारी नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद तथा संकलन कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार जैन अजमेरा ने दी।