यह संसार मतलब का है – प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि म.सा.

फरिदकोट । जैन स्थानक में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए श्रमण संघीय प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने संसार की परिभाषा करते हुे कहा जहां आवागमन एक गति से दूसरी गति में जाना आना जीव का बना रहता है उसे ही संसार कहते है । मुख्यत: चार प्रकार के स्थान गति बतलाई गई है । नरक तिर्चय मनुष्य देव गति से यह आत्मा अपने बांधे हुए र्को क अनुसरण भव-भ्रमण करता चला जाता है । इसमें देव मनुष्य गति को शुभ पवित्र माना गया है एवं तिर्यच नरक को कष्टमय माना गया है। मानव जीवन में जैसा भी कर्म अच्छा बुरा करता है वैसा ही गति का बंधन हो जाता है। हमारा मन पाप करके अच्छे फल चाहता है जो कदापि संभव नहीं है । पाप का पाप रूप में, पुण्य का पुण्य रूप में परिणाम फल मिलता है । किसान जैसा बीच होता है वैसा ही फल की प्राप्ति करता है । अत: मनुष्य को चाहिए कर्म करते समय सावदान रहे । अपने मन को वश में रखते हुए बुरे कार्यो से दूर रहे । सभा में साहित्यकार सुरेन्द्र मुनि द्वारा भावों की व्याख्या करते हुए शुद्ध भाव बनाए रखने पर जोर दिया । शालिभद्र राजकुमार का उदाहरण देते हुए कहा गरीब ग्वाले का बालक तपस्वी मुनिराज को आहार दान प्रदान करते हुए विशुद्ध पवित्र भाव रखता है परिणाम स्वरूप वहीं शालिभद्र के रूप में वैभवशाली जीवन जीता है । अंत में संयम साना के मार्ग को भी ग्रहण कर लेता है । अत: अपने भावों को ऊपर उठाने का सतत प्रयत्न करना चाहिए । प्रधान प्रवक्ता जैन व मंत्री पंकज जैन ने होल्ी उत्सव पर समाज एवं देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए धर्मसभा में सम्मिलित समाजजनों का स्वागत किया ।

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