“सत्य को भगवान कह गए हैं तीर्थंकर महावीर” – जैनाचार्य श्रीपूज्य श्री जिनचंद्र सूरि जी महाराज साहब

‘मन की सत्य से मुलाकात’ विषय पर अक्षत परिसर में धर्मसभा, बड़ी संख्या में उमड़े श्रद्धालु

इंदौर। “सत्य को भगवान कह गए हैं तीर्थंकर महावीर। मनुष्य जीवन मिला है तो उसका सर्वोच्च उद्देश्य स्वयं के सत्य को जानना और साधना के माध्यम से मुक्ति की दिशा में अग्रसर होना है।” जैनाचार्य श्रीपूज्य श्री जिनचंद्र सूरि जी महाराज साहब ने मंगलवार को गुमास्ता नगर स्थित अक्षत परिसर में आयोजित विशाल धर्मसभा में ‘मन की सत्य से मुलाकात’ विषय पर संबोधित करते हुए यह उद्गार व्यक्त किए।
श्रीपूज्य गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य जीवन साधना के लिए मिला दुर्लभ अवसर है, इसलिए सत्य साधना ध्यान को जीवन में प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। अरिहंत, केवली एवं मुक्त अवस्था की उपलब्धि एक ही जन्म में संभव है, किंतु तीर्थंकरत्व की साधना भव-भव के पुरुषार्थ से पुष्ट होती है और किसी जीव को यह परम दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है। तीर्थंकर की भावदशा में सर्वजीव कल्याण की भावना सदैव विद्यमान रहती है।
उन्होंने कहा कि तीर्थंकर भगवान महावीर ने स्वयं कठिनतम साधना और पुरुषार्थ कर मानव मात्र के कल्याण के लिए सत्य के अनुभव का मार्ग प्रशस्त किया। भगवान महावीर के हम पर अनंत उपकार हैं। उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा और कृतज्ञता केवल वंदना तक सीमित न रहकर उनकी साधना-देशना को अपने जीवन में उतारने में अभिव्यक्त होनी चाहिए। सत्य साधना ध्यान इसी दिशा में प्रयोगात्मक यात्रा है।

ज्ञान से सम्यक् ज्ञान की यात्रा है सत्य साधना
श्रीपूज्य गुरुदेव ने शास्त्र ज्ञान और स्व-अनुभव के संबंध को समझाते हुए कहा कि शास्त्रों से प्राप्त प्रेरणा हमें ज्ञान प्रदान करती है, किंतु सत्य साधना में जब उन्हीं सत्यों को साधक स्वयं के भीतर अनुभव करता है और सजगता एवं समता में रमते हुए ‘स्व’ का बोध प्राप्त करने लगता है, तब ज्ञान के सम्यक् ज्ञान में रूपांतरण की यात्रा प्रारंभ होती है।
सत्य साधना में गहरे उतरने वाले साधक अंतर्दृष्टि की अवस्था को अनुभव करने लगते हैं। वे प्रतिक्षण अपने भीतर की दशा के प्रति सजग रहते हैं। यहीं से सम्यक् दृष्टि की शुरुआत होती है। साधना की निरंतरता और पुरुषार्थ के साथ यही यात्रा क्रमशः सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र की दिशा में आगे बढ़ने का सोपान बनती है।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की यही साधना-देशना आचारांग सूत्र के प्रत्येक पृष्ठ पर साधक को आत्मजागरण की प्रेरणा देती दिखाई देती है।

“जगत में कोई न परमानेंट…” से आर्या श्री ने जगाई आत्मचेतना
धर्मसभा का शुभारंभ बालिका त्रिशा मेहता के मंगलाचरण से हुआ। प्रारंभिक उद्बोधन में आर्या श्री समकित प्रभा श्री जी महाराज साहब ने अत्यंत प्रेरक शैली में कहा कि मनुष्य जीवन का मूल प्रयोजन संसार में उलझते चले जाना नहीं, बल्कि बंधनों से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ना है। किंतु जैसे-जैसे मनुष्य सांसारिक जीवन में आगे बढ़ता है, वह अपने इस मूल प्रयोजन को विस्मृत करता चला जाता है।
आर्या श्री ने अपनी स्वरचित कविता “जगत में कोई न परमानेंट…” के माध्यम से जीवन की अनित्यता और आत्मजागृति का संदेश देते हुए प्रेरणा के प्रसून बिखेरे। उन्होंने श्रवण की कला का महत्व समझाते हुए कहा कि सुनना केवल कानों से न हो, बल्कि ऐसा हो कि धर्मवाणी हृदय में उतरती चली जाए। यही सच्चे श्रावकत्व की दिशा है और इसे जीवन में अनुभव के स्तर तक ले जाने के लिए सत्य साधना आवश्यक है।

आगम सूत्रों से यतिवरों ने जगाई साधना की प्रेरणा
यतिप्रवर श्री सुमति सुंदर जी महाराज साहब ने अपने चिर-परिचित रोचक अंदाज में सहज एवं रुचिकर उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि सही समझ ही जीवन को सार्थक दिशा प्रदान करती है। विवेक और सजगता के अभाव में वही जीवन व्यर्थ भी हो सकता है। यतिप्रवर श्री अमृत सुंदर जी महाराज साहब ने सहज, सरल एवं सौम्य अभिव्यक्ति में आगम के छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से साधना की गहरी प्रेरणा प्रदान की। उनकी सरल व्याख्या ने श्रोताओं को आगम-वाणी में निहित आत्मजागरण के संदेश से जोड़ा।

बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने लिया धर्मदेशना का लाभ
आयोजन के लाभार्थी कांकरिया परिवार सहित विभिन्न श्रीसंघों की ओर से श्रीपूज्य गुरुदेव को कांबली अर्पित की गई। कार्यक्रम का सफल संचालन विशाल सिंघवी ने किया। कार्य दिवस होने के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर श्रीपूज्य गुरुदेव एवं यति-आर्या मंडल की धर्मदेशना का लाभ लिया। प्रतीक कांकरिया एवं राकेश बांठिया ने जानकारी देते हुए बताया कि धर्मसभा में इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव, भरत पारख, जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन के पदाधिकारी, विभिन्न जैन श्रीसंघों के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
समूची धर्मसभा का केंद्रीय संदेश यही रहा कि सत्य केवल जानने या मानने का विषय नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरकर अनुभव करने का विषय है—और सत्य साधना ध्यान मन को उसी सत्य से मिलाने की प्रयोगात्मक अंतर्यात्रा है।

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