
इंदौर (राजेश जैन दद्दू)। छत्रपति नगर स्थित दलाल बाग देशना मंडप में मुनि श्री ने कहा – श्रद्धा का अर्थ है जहाँ आँखें नहीं पहुँचतीं वहाँ जिनवाणी पर विश्वास। दान और बोली का समय पर भुगतान करो दलाल बाग में चातुर्मास देशना मंडप में श्रमण निर्यापक मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने मंगलवार की धर्मसभा में श्रद्धा, आत्मीयता और धर्म के प्रति समर्पण पर विस्तृत देशना दी। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आज की मंगल देशना में कहा कि श्रद्धा और जिनवाणी का महत्व मुनि श्री ने कहा “विश्व का शायद ही कोई ऐसा देश या समाज होगा जहाँ मनुष्य किसी न किसी अदृश्य शक्ति पर विश्वास न करता हो।
उन्होंने कहा भौतिकता आँखों का विषय है, लेकिन भगवान और जिनवाणी कानों के विषय हैं। तीर्थंकर जैसे महान व्यक्तित्व भी जिनवाणी और गणधर परमेष्ठी की देशना सुनकर ही मोक्षमार्ग की ओर बढ़े।
“जब हमारे मुनि महाराज के पिता स्वयं जिनेन्द्र देव हैं, तो हमें अपने उस पिता पर संदेह नहीं करना चाहिए।” श्रद्धा का अर्थ ही है जहाँ हमारी आँखें नहीं पहुँचतीं, वहाँ जिनवाणी और गुरु की देशना पर विश्वास रखना।
आत्मीयता का वास्तविक लक्ष्य
गुरुदेव ने कहा आत्मीयता केवल प्रेम के शब्दों का नाम नहीं है। यह उस भावना का नाम है जहाँ एक के दुःख में दूसरा दुःखी हो जाए।
दुःख गुरु को होता है तो दुःखी तुम होते हो। साधु को अंतराय आती है तो आँसू तुम्हारी आँखों से निकलते हैं। भूख तुम्हें लगती है तो चिंता तुम्हारी माँ और पत्नी करती हैं।”*
यही आत्मीयता का लक्ष्य है – कौन तुम्हें कितना चाहता है, इसका प्रमाण तुम्हारे सुख में नहीं, तुम्हारे दुःख में मिलता है।
घर में मनुहार और शगुन
मुनि श्री ने गृहस्थ जीवन का सूत्र देते हुए कहा “जहाँ मनुहार होती है, वहाँ शगुन होता है।”इसलिए घर में कभी माँगकर भोजन या पानी नहीं लेना चाहिए। प्रेम से निमंत्रण मिले तभी ग्रहण करना चाहिए।
“जिस घर में परस्पर प्रेम, सम्मान और मनुहार की परंपरा है, वहाँ कभी अन्न की कमी नहीं होती। वहाँ सदा अन्नपूर्णा का वास बना रहता है।”
धर्म और मंदिर की संपत्ति के प्रति सावधानी
सबसे कड़ा संदेश देते हुए मुनि श्री ने कहा “धर्म के साथ कभी मजाक मत करना। मंदिर की संपत्ति, दान और धार्मिक कार्यों में कभी अपनी नीयत खराब मत करना।”
उन्होंने कहा यदि पूर्व जन्म में मंदिर के दान या बोली का भुगतान नहीं किया तो इस जन्म में उसका परिणाम भोगना पड़ सकता है। बोली लेकर धार्मिक कार्य भी हो जाए, नाम भी हो जाए, समय भी निकल जाए और भुगतान न किया जाए – यह बहुत बड़ा दोष है। गुरुदेव ने कहा धर्म से खिलवाड़ मत करो। अन्यथा पछतावा होगा और उस पछतावे के आँसू पोंछने के लिए शायद सुधा सागर के पास रूमाल भी कम पड़ जाए।
जैन समाज की समृद्धि का कारण
मुनि श्री ने कहा जैन समाज की समृद्धि के पीछे वचनबद्धता और दान की भावना है। जैन श्रावक के मुख से जो एक बार निकल गया उसे पूरा किया जाता है। दान तभी फलता है जब उसके पीछे शुद्ध भावना, स्पष्ट संकल्प और वचन को पूरा करने की दृढ़ता हो।
अंत में गुरुदेव ने कहा “हमारी वजह से धर्म नहीं है, हम श्रावक और मुनि धर्म की वजह से हैं।” इसलिए धर्म को अहंकार, स्वार्थ या मजाक का विषय कभी मत बनाओ। इस अवसर पर देशना मंडप में अशोक डोसी आकाश आलोक कोल,अनील अंचल आनंद नवीन गोधा सपना मनीष गोधा हुकम काका हर्ष जैन भुपेंद्र जैन डॉ जैनेन्द्र जैन विपुल बाझलं श्रुत जैन एवं सोनाली बागढीया अर्चना गोधा आदि समाज श्रेष्ठी उपस्थित रहे।