*ऋषभ विहार में धर्मसभा – धर्म का अर्थ संप्रदाय नहीं, जन कल्याण है। पश्चाताप और आलोचना से चित्त प्रसन्न रखो

नई दिल्ली/इंदौर(राजेश जैन दद्दू) । दिल्ली स्थित ऋषभ विहार में विराजित दिगम्बर जैन धर्म के उन्नायक पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए धर्म, समाज और नैतिकता पर सारगर्भित प्रवचन दिया। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि गुरुदेव ने अपनी मंगल देशना में कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप “सहज-शांत प्रकृति, क्षमाशील, नैतिक-व्यक्ति ही धार्मिक हो सकता है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म में वास्तव में कोई संप्रदाय नहीं है। सत्य-धर्म वही है जो जन-जन के कल्याण, सुख-शांति और आनंद में सहयोगी बने। धर्म का उद्देश्य भेद नहीं, बल्कि मानवता की सेवा और उत्थान है। सैनिक और संत एक समान। आचार्य श्री ने समाज के दो स्तंभों की तुलना करते हुए कहा “सैनिक और संत एक समान हैं।” साधु संत नैतिक-धार्मिक उपदेश देकर जन-जन को नैतिक पतन से बचाते हैं, पापों से रक्षा करते हैं। ऐसे ही देश के सैनिक होते हैं जो शत्रुओं से देश की रक्षा करते हैं।”
उन्होंने कहा संत और साधु दोनों ही देश की रक्षा एवं उत्थान में सहयोगी बनते हैं। जिस देश में संत, सैनिक, साहूकार और विद्वान हों, वहीं प्रवास करना चाहिए। देश के विकास में साधु, सैनिक और साहित्यकार का बहुत बड़ा योगदान होता है।
शल्य हटाओ, शांति पाओ
गुरुदेव ने जीवन को कष्टकारी बनाने वाले “शल्य” पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा व्यक्ति को शूल से भी अधिक कष्टकारी जो चुभता है उसका नाम है शल्य।”
व्यक्ति जो कार्य कषाय से प्रभावित होकर, कुटिलता पूर्वक करता है, छिपाकर करता है वह उसे शल्य बन जाती है।”
इससे बचने का उपाय बताते हुए मुनिराज ने कहा शल्य हटाओ, सुखी हो जाओ।” यदि कोई पाप हो गया है तो उसका पश्चाताप, प्रायश्चित्त और आलोचना करो। इससे चित्त प्रसन्न रहता है और आत्मा हल्की होती है।
धर्मसभा के अंत में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के वचनों को जीवन में उतारने का संकल्प लिया और “जय जिनेन्द्र” के जयकारों के साथ सभा सम्पन्न हुई।
“गुरुवाणी के 3 सूत्र”*
- धर्म: सत्य धर्म वही जो जन कल्याण और शांति में सहायक बने
- समाज: संत-सैनिक-साहूकार-विद्वान वाले देश का ही उत्थान होता है
- आत्मशुद्धि: शल्य = छिपा हुआ पाप। पश्चाताप और आलोचना से इसे हटाओ