संतों का सानिध्य और मार्गदर्शन जीवन को सही दिशा देता है  

डोंगरे जी महाराज अपनी कीर्ति स्वंय थे – स्वामी श्री श्री 1008  विशोकानंद  जी भारती

रतलाम 24 अगस्त। डोंगरे जी महाराज परोपकारी एवं समाज सुधारक थे उनकी कथा से जो भी द्रव्य प्राप्त होता था उसे वह पाठशालाओं एवं मंदिरों को दे देते थे डोंगरे जी महाराज अपनी कीर्ति स्वंय थे । उक्त वक्तव्य निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती ने त्रिवेणी तट पर स्थित परम पूज्य गुरूदेव श्री रामचन्द्र जी डोंगरे जी महाराज की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्जवलन के पश्चात धर्मसभा में धर्मप्रेमी जनता को सम्बोधित करते हुए कहीं । आपने डोंगरे महाराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि संतो के द्वारा प्रवचनों में उनके वचनों को ध्यान से, शांतचित से सुनना एवं उन्हें मन में उतारना चाहिए। सत्संग, परमात्मा की प्राप्ति में व्यवधान नहीं होना चाहिए। संतो का सानिध्य और मार्गदर्शन जीवन को सही दिशा देता है । इसलिए जब भी संतो का सानिध्य मिले उसका लाभ लेना चाहिए। आपने कहा कि निष्ठा वाले दो ही मार्ग है ज्ञान मार्ग और धर्म मार्ग । बद्रीनारायण सेवा ट्रस्ट द्वारा चलाए जा रहे अन्न क्षैत्र के बारे में कहा कि आपको अन्न क्षेत्र दिया और मुझे ज्ञान क्षेत्र दिया। डोंगरे जी महाराज में वो सामर्थ्य था कि उन्होंने ज्ञान को जाना ही नहीं वरन माना भी सहीं। यह सामर्थ्य होना बहुत बड़ी बात है।
इस अवसर पर श्री बद्रीनारायण सेवा ट्रस्ट के द्वारा महामंडलेश्वर स्वामी श्री विशोखानंदजी भारती का ट्रस्ट अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र शर्मा, सचिव नवनीत सोनी, सनातन धर्म सभा अध्यक्ष अनिल झालानी, किशोर मित्तल, पार्षद विशाल शर्मा, सत्यनारायण पालीवाल, नारायण राठौड़ आदि द्वारा स्वामीजी का शाल श्रीफल एवं माला पहनाकर स्वागत सम्मान किया गया ।
इस अवसर स्वामी स्वामी देवस्वरूपानंद जी ने भी धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आशीवचन दिए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में अनुयायी एवं धर्मालुजन उपस्थित थे।

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