चातुर्मास में चल रहा अखंड ज्ञान आश्रम में कठोपनिषद स्वाध्याय एवं श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन

रतलाम 24 अगस्त । स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत सोमवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर धर्मलाभ लिया।
प्रवचन में आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी भारती ने संतों की महिमा बताते हुए कहा कि संत तीर्थ के समान होते हैं। जब गंगा भी दूषित हो जाती है, तब संत अपने पुण्य और तपस्या से उसे पुनः जागृत एवं चैतन्य करने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को केवल भगवान से अपने पापों की क्षमा मांगने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने आचरण और कर्मों में भी परिवर्तन लाना चाहिए। सच्ची साधना वही है, जिसमें मनुष्य अपने जीवन को पवित्र बनाने का प्रयास करे।
स्वामी जी ने जीवन की नश्वरता और मनुष्य के कर्मों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य सांसारिक बंधनों में इस प्रकार जकड़ा हुआ है, जैसे उसके गले में फांसी लगी हो। नाड़ियों और सांसारिक मोह-माया के बंधनों से मुक्त होकर आत्मकल्याण के मार्ग पर चलना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन रहते ही सत्य को समझना चाहिए, क्योंकि बार-बार जन्म-मरण के चौरासी के चक्र में भटकने के बजाय वर्तमान जीवन को साधना और आत्मबोध के लिए सार्थक बनाना चाहिए।
उन्होंने अखंड ज्ञान आश्रम को साधना और आध्यात्मिक जीवन के लिए भविष्य का पाथेय बताते हुए कहा कि सत्संग, साधना और संतों का सानिध्य ही जीवन की वास्तविक आध्यात्मिक पूंजी है। मनुष्य को समय रहते इस मार्ग को अपनाकर अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।
प्रवचन के पश्चात स्वामी जी का स्वागत चरण सिंह जादव, पंडित रामचंद्र शर्मा एवं कैलाश राठौड़ मावा वाला ने किया। कार्यक्रम में अशोक तिवारी की ओर से प्रसादी की व्यवस्था की गई। इस अवसर पर आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु एवं भक्तजन उपस्थित रहे।