
इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । दलाल बाग परिसर स्थित विद्या सुधा मंडप में श्रमण संस्कृति के महा श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने सोमवार को देशना देते हुए कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि भगवान, गुरु और धर्म का सहारा मिलते ही वह निश्चिंत होकर अपने पुरुषार्थ को छोड़ देता है। भगवान का भरोसा जागने के लिए है, सोने के लिए नहीं।
महाराज ने कहा कि योग्यता वस्तु में होती है और निमित्त उसे प्रकट करने का माध्यम बनता है। दीपक में जलने की योग्यता हो तभी माचिस उसे जला सकती है। इसी प्रकार गुरु और संतों का सान्निध्य निमित्त है, लेकिन ज्ञान ग्रहण करना और पुरुषार्थ करना स्वयं की जिम्मेदारी है।
उन्होंने माँ की गोद का उदाहरण देते हुए कहा कि माँ की गोद केवल सुलाने के लिए नहीं, संस्कार और शिक्षा देने की पहली पाठशाला है। इसी प्रकार गुरु की छाया विश्राम के लिए नहीं, जागने और जीवन बदलने के लिए है। महाराज ने कहा कि डर से कराया गया धर्म स्थायी नहीं होता। गुरु के डर से सामायिक या नर्क के भय से पाप छोड़ना पर्याप्त नहीं, धर्म तब जीवन में उतरता है जब उसे अपने स्वभाव और कर्तव्य के रूप में स्वीकार किया जाए। उन्होंने कहा—“पाप करके मत भागो, पाप से भागो।”
संस्कार शिविर में जागरण और संस्कार की कमाई
महाराज ने संस्कार शिविर को भी इसी आत्मजागरण की महत्वपूर्ण कड़ी बताते हुए कहा कि बच्चों और युवाओं को केवल पढ़ाई एवं भौतिक सफलता की ओर नहीं, बल्कि संस्कार, धर्म, अनुशासन, आत्मविश्वास और जीवन-मूल्यों की ओर भी ले जाना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पर्यूषण पर्व में लगने वाले संस्कार शिविर बच्चे को सुलाने का नहीं, जगाने का माध्यम है। यहां बच्चे केवल धार्मिक बातें सुनने नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारने की प्रेरणा प्राप्त करेंगें। माता-पिता अपने बच्चों को शिविर में भेजें और स्वयं भी उनके साथ धर्म एवं संस्कार की इस यात्रा में सहभागी बनें।
पर्यूषण पर्व की चर्चा करते हुए महाश्रमण ने कहा कि पर्व के दिनों में धर्म करना विकास का माध्यम है एवं आप करना विनाश का कारण है। पर्व के दिनों में आरंभ परिगृह का त्याग करना चाहिए और अधिक से अधिक व्रत उपवास एवं धर्म ध्यान करना चाहिए। इन दिनों में किया गया एक दिन का उपवास भी 6 माह के उपवास के बराबर का फल देता है।
चातुर्मास के महत्व पर उन्होंने कहा कि धन-दौलत और सांसारिक सुख फिर मिल सकते हैं, लेकिन इस वर्ष मिला संत-सान्निध्य, ज्ञान और संस्कार का अवसर अगले वर्ष भी मिले, यह निश्चित नहीं। इसलिए चातुर्मास और संस्कार शिविर के प्रत्येक अवसर का पूरा लाभ उठाना चाहिए।
उन्होंने कहा—“गुरु मिल गए हैं तो सोना नहीं है, ज्ञान कमाना है। भगवान मिला है तो निश्चिंत नहीं होना, जागना है। खजाना मिला है तो जितना ले सकते हो, ज्ञान और संस्कार लेलो।
इस अवसर पर धर्म समाज प्रचारक राजेश दद्दू , संजय पाटौदी, चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन जी गोधा, शिविर संयोजक आकाश कोल,राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रमुख राकेश गोहिल, चांदखेड़ी तीर्थ के अध्यक्ष हुकुमचंद जैन काका, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद जी गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक जी डोशी, महामंत्री हर्ष जी जैन आलोक जैन छत्रपति नगर अध्यक्ष भूपेंद्र जैन,प्रिंसपाल टोंग्या टोंग्या, रानी डोशी, सोनाली बागड़िया सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।