
नई दिल्ली (राजेश जैन दद्दू ) । ऋषभोदय में विराजित दिगम्बर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि— जीवन में व्यक्ति स्वयं के दुःख से कम दुःखी है, पर अधिक दुःखी इसलिए है कि— हमारा पड़ोसी सुखी क्यों है, हमारा भाई सुखी क्यों है। अधिकांशतः लोग दूसरों के सुख से दुःखी हैं। व्यक्ति को सुखी जीवन जीना है, तो उसे स्वयं के पुण्य को देखना चाहिए। अपने भाग्य पर दृष्टि रखना चाहिए।
चोंच मिली है, तो दाना भी मिलेगा
जानिये! जीवन में अपने पुण्य पर विश्वास रखना। सबका अपना-अपना पुण्य होता है। एक चींटी का भी अपना पुण्य होता है, उसे भी पेट भरने के लिए मीठा मिल जाता है। एक चिड़िया को भी चोंच मिली है तो उसे चुगने के लिए दाना मिल जाता है।
सबका अपना-अपना भाग्य, किस्मत है। न किसी का अपमान करो, न किसी को दुत्कारो। परस्पर में एक-दूसरे का सहयोग करो। स्व-उपकार के साथ पर का भी उपकार करो। अपनी शक्ति अनुसार दान करें।
कोई ईश्वर हमारा पेट नहीं भरता है। हमारे भाग्य और पुरुषार्थ से ही हमारा पेट भरता है। कोई भगवान हमारे कर्ता नहीं हैं। कोई देव हमें नहीं जिताता, हम अपनी आयु से ही जीते हैं। भाग्य प्रबल होता है, तो जंगल में भी मंगल हो जाता है।
प्रदर्शन मत करो, चित्त को संभालो
साधक को साधना का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। अपने चित्त और चारित्र को संभालना चाहिए। जो अपने चित्त को संभाल लेता है, उसका चारित्र संभल सकता है।