
इन्दौर (राजेश जैन दद्दू)। मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने विद्या सुधा देशना मंडप में धर्म सभा को संबोधित करते हुए श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, पुरुषार्थ, ईमानदारी और माता-पिता तथा गुरुजनों के प्रति निष्कपटता का गहरा संदेश दिया। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि मुनिश्री ने प्रेरणास्पद प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अपने दुख, असफलता और कमजोरी के लिए हमेशा दूसरे व्यक्ति, परिस्थितियों और निमित्त को दोष देता रहता है।
गुरुदेव ने कहा कि हमारी धारणा होती है—“मैं बुरा हूँ तो सारा जगत बुरा है।” कई लोग कहते हैं—“महाराज, मैं सुधर जाऊँगा, पहले जगत को सुधारने दीजिए।” लेकिन यह कभी संभव नहीं होगा। जिस दिन पूरा जगत सुधर जाएगा, उस दिन संसार ही मोक्ष के समान हो जाएगा। इसलिए दूसरों के सुधरने की प्रतीक्षा करना छोड़कर स्वयं के भीतर सुधार की शुरुआत करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि हम अक्सर कहते हैं—“उसने मुझे दुख दिया, इसलिए मैं दुखी हूँ”, “मेरा समय खराब है”, “मेरी किस्मत खराब है”, “समय आएगा तो मैं धर्म करूँगा।” यह सब निमित्त को दोष देने की प्रवृत्ति है। मनुष्य को अपने उपादान, अपने भाव और अपने पुरुषार्थ को देखना चाहिए।
दान धन से नहीं, भावना से होता है
गुरुदेव ने दान की भावना पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि लोग अक्सर कहते हैं—“मेरे पास धन नहीं है, इसलिए मैं दान नहीं कर सकता।” उन्होंने इसे भी एक बहाना बताते हुए कहा कि दान केवल बड़ी धनराशि देने का नाम नहीं है। व्यक्ति के पास जितना है, उसमें से अपनी सामर्थ्य के अनुसार देना ही वास्तविक दान है।
उन्होंने कहा कि जब धन था तब नहीं दिया और आज धन नहीं है तो धन को दोष देना उचित नहीं। दान के लिए धन से पहले निर्मल भावना, त्याग और संवेदना आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि तुम दुनिया को धोखा दे सकते हो लेकिन आत्मा और परमात्मा को नहीं
गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य संसार को भ्रमित कर सकता है, लेकिन अपनी आत्मा और परमात्मा को कभी मूर्ख नहीं बना सकता। उन्होंने श्रद्धालुओं को संकल्प दिलाने की भावना से कहा कि गुरु, माता-पिता और अपने पूज्यजनों के सामने कभी झूठ, छल-कपट या मायाचारी नहीं करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म केवल बाहरी प्रदर्शन का नाम नहीं है। वास्तविक धर्म तो तब है जब हमारे भीतर और बाहर एक ही सत्य हो। उन्होंने कहा कि अपने माता-पिता के सामने अपनी जिंदगी की किताब खुली रखिए”
प्रवचन के दौरान भगवान श्रीकृष्ण और माता यशोदा के प्रसंग के माध्यम से गुरुदेव ने माता-पिता के प्रति पारदर्शिता का अत्यंत मार्मिक संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि महान पुरुषों के जीवन की प्रत्येक घटना से कोई न कोई शिक्षा मिलती है। हमें केवल घटना या कमी नहीं देखनी चाहिए, गुरुदेव ने युवाओं से कहा तुम्हारी जिंदगी तुम्हारे हाथ में है तुमअपनी जिंदगी को माता-पिता के सामने खुली किताब बना दीजिए।” दुनिया से भले कोई बात छिप जाए, लेकिन जिसने जन्म दिया है, उसके सामने अपनी जिंदगी का हर पन्ना खुला होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आप बाजार में हों, घर में हों, मित्रों के साथ हों या कहीं बाहर हों—मन में यह भाव होना चाहिए कि “मैं जो कर रहा हूँ, उसे अपने माता-पिता से छिपा नहीं रहा हूँ।”
यदि मन में कोई गलत विचार भी आ जाए तो उसे दबाकर रखने के बजाय माता-पिता से अपनी परेशानी साझा करनी चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि डॉक्टर से बीमारी छिपाने पर सही उपचार नहीं हो सकता, उसी प्रकार माता-पिता से अपनी समस्या छिपाने पर उसका समाधान कठिन हो जाता है।
गुरुदेव ने कहा कि यही नियम गुरु और धर्म के क्षेत्र में भी लागू होता है। सच्चा शिष्य वही है जो गुरु के सामने अपनी जिंदगी का कोई पन्ना छिपाता नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि मन में कोई गलत विचार चल रहा है तो गुरु से कहिए कि गुरुदेव, मेरे मन में यह विचार आ रहा है।” गुरु का कार्य शिष्य की कमजोरी को समझकर उसे सही दिशा देना है। पाप से घृणा करनी चाहिए, पापी से नहीं।
साथ ही उन्होंने यह भी समझाया कि आध्यात्मिक जीवन में सच्चे और योग्य गुरु का चुनाव विवेकपूर्वक करना आवश्यक है।
सच्चा वैराग्य बहाने नहीं बनाता
गुरुदेव ने एक प्रसंग के माध्यम से बताया कि एक व्यक्ति ने कहा कि उसका विवाह जबरदस्ती कराया जा रहा है, जबकि वह दीक्षा लेना चाहता है। गुरुदेव ने कहा कि यदि वैराग्य सच्चा है तो उसे कोई डिगा नहीं सकता है, जबकि कमजोर इच्छा बहाने खोजती है।
उन्होंने कहा कि गलती हो जाए तो उसे स्वीकार करने में एक क्षण भी नहीं लगाना चाहिए। जहाँ गलती है, वहाँ स्वीकार और प्रायश्चित; जहाँ गलती नहीं है, वहाँ सत्य पर अडिग रहना चाहिये।
गुरुदेव ने श्रद्धालुओं से कहा कि इसके लिए कोई बड़ी तपस्या आवश्यक नहीं है। केवल एक छोटा-सा नियम जीवन में उतार लें
कि मैं आज से अपने माता-पिता से झूठ नहीं बोलूंगा और
उनसे कोई महत्वपूर्ण बात नहीं छिपाऊँगा।
गुरुजनों के सामने भी छल-कपट नहीं करूँगा।
भगवान और अपनी आत्मा के सामने कभी असत्य नहीं रखूँगा।”
उन्होंने कहा कि जिस दिन व्यक्ति माता-पिता, गुरु और अपनी आत्मा के सामने खुली किताब बन जाएगा, उसी दिन उसके जीवन में वास्तविक परिवर्तन की शुरूआत हो जाएगी।
धर्म सभा में चातुर्मास अध्यक्ष मनीष सपना गोधा आनंद नवीन जी गोधा, हुकमचंद जैन काका, आकाश कोल,अशोक डोशी, हर्ष जैन, हंसमुख गांधी,विजय पाटौदी, संजय पाटौदी, विकास पाटौदी, कमल अग्रवाल,भूपेंद्र जैन, कमल जैन चेलेंजर, डॉ जैनेंद्र जैन,अर्चना गोधा, रानी डोसी सोनाली बागढीया सहित बड़ी संख्या में समाज जन उपस्थित रहे।