आत्मानुशासक ही श्रेष्ठ-शासक अनुशासन-प्रिय- पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी

नई दिल्ली (राजेश जैन दद्दू) । ऋषभोदय में विराजित दिगम्बर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्म-सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि— आत्मानुशासक ही श्रेष्ठ-शासक अनुशासन-प्रिय, आत्मानुशासक ही देश-राष्ट्र का सच्चा-सम्राट (शासक) हो सकता है। राजा, सम्राट को मात्र स्वयं का ही हित नहीं सोचना चाहिए। सम्राट को मात्र स्वयं के देह-सुख, इन्द्रिय-सुख की चाह नहीं रखना चाहिए। सम्राट को देशहित, नागरिकों के हित में कार्य करना चाहिए।
जो शासक स्वयं के साथ प्रजा का भी ध्यान रखता है, उनके सुख-दुःख में सहभागी बनता है, नागरिकों की रक्षा करता है, वही श्रेष्ठ-स्वामी होता है। जो स्वयं पर अनुशासन कर लेता है, वही दुनिया पर शासन कर सकता है।

अनुशासन-प्रियता ही सज्जनता की पहचान
सज्जन-व्यक्ति ही अनुशासन-प्रिय हो सकता है। जो अनुशासन-प्रिय होता है, वही जीवन में सफलताएँ, प्रशंसा, सुख एवं शांति प्राप्त करता है। अनुशासन सिद्धि का साधन है। अनुशासन से ही व्यक्ति के कुल की पहचान होती है। अनुशासन-प्रिय कुलीन-पुरुष ही होते हैं। सज्जन, कुलीन-पुरुष विपत्ति आने पर भी अपना अनुशासन नहीं छोड़ते हैं।

प्रतिकूल मित्र, अनुकूल शत्रु
मित्र भी प्रतिकूल हो सकता है, शत्रु भी अनुकूल हो सकता है। जो मित्र कु-मार्ग पर लगाए, वह प्रतिकूल मित्र है, जो शत्रु कुकर्मों से बचा ले, वह अनुकूल शत्रु है।

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