अहंकार मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण : स्वामी विशोकानंद जी भारती

श्री अखंड ज्ञान आश्रम में कठोपनिषद स्वाध्याय एवं श्रीमद्भागवत कथा में उमड़े श्रद्धालु

रतलाम। स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत सोमवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। कथा एवं प्रवचन का श्रवण करने बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
प्रवचन में आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी भारती ने कहा कि अहंकार मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण है। इक्ष्वाकु वंश में अनेक महान पुरुष हुए, लेकिन अहंकार ने बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को भी विचलित किया है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में अहंकार का त्याग कर विनम्रता एवं सद्भाव को अपनाना चाहिए।
उन्होंने राजा अम्बरीष और महर्षि दुर्वासा के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि राजा अम्बरीष भगवान के अनन्य भक्त थे। एक प्रसंग में दुर्वासा ऋषि के क्रोध से उत्पन्न कृत्या अम्बरीष की ओर बढ़ी, लेकिन भगवान के सुदर्शन चक्र ने उसकी रक्षा की। कृत्या से बचने के लिए दुर्वासा ऋषि अनेक देवताओं के पास गए, लेकिन अंततः उन्हें राजा अम्बरीष की शरण में ही आना पड़ा। अम्बरीष ने उनका सम्मान किया और क्षमा भाव रखते हुए कहा कि जो हो गया, सो हो गया। यह प्रसंग हमें क्षमा, भक्ति और विनम्रता का संदेश देता है।
स्वामी जी ने राजा सगर के पुत्रों के उद्धार के लिए मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा भी सुनाई। उन्होंने भगवान श्रीराम के चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं। नारद मुनि से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि नारद के श्राप के कारण भगवान श्रीराम को भी सीता वियोग का दुख सहना पड़ा।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने स्वयं माया के स्वरूप और उसके प्रभाव को समझाया है। मनुष्य संसार की माया में इस प्रकार उलझ जाता है कि उसे उससे बाहर निकलना कठिन हो जाता है। घर-परिवार और सांसारिक मोह में मनुष्य किस प्रकार बंधता चला जाता है, यह समझाने के लिए उन्होंने हास्य-विनोदपूर्ण प्रसंग के माध्यम से श्रद्धालुओं को जीवन की वास्तविकता से परिचित कराया।
प्रवचन के दौरान स्वामी जी ने कहा कि भगवान के चरित्र एवं कथाओं का श्रवण केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने के लिए होना चाहिए। कथा हमें अहंकार, मोह और क्रोध का त्याग कर भक्ति, क्षमा, संयम एवं सदाचार का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देती है।
प्रवचन के पश्चात आरती संपन्न हुई। इसके बाद श्रद्धालुओं को प्रसादी का वितरण किया गया, जिसकी व्यवस्था बसंतीलाल कसेरा की ओर से की गई। कार्यक्रम में आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु एवं भक्तजन उपस्थित रहे।

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