
लेखक – दिनेश शर्मा, अध्यक्ष शिक्षक सांस्कृतिक मंच रतलाम
वैसे तो हमारी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था का दारोमदार सरकार पर होता है मंत्री अधिकारी और अनेक सहयोगी संगठनों के माध्यम से इस पर नियंत्रण रखा जाता है लेकिन वास्तविकता के धरातल पर यदि कोई हमारे शिक्षण संस्थाओं का रखवाला कोई होता है तो वह सिर्फ और सिर्फ हमारा शिक्षक साथी होता है सरकारी स्कूलों में होने वाली अव्यवस्था दुर्घटनाएं लापरवाही गिरते हुए परीक्षा का सारा जिम्मा शिक्षक के ऊपर डाल दिया जाता है मध्यान भोजन से लेकर स्कूल परिसर की गंदगी और अब तो दुष्कर्म के किस्से भी बहुत आने लगे हैं उसके लिए कहीं ना कहीं शिक्षक की भूमिका को कटघरे में खड़ा किया जाता है क्या यह सही है। माना की शिक्षा व्यवस्था का प्रमुख भाग हमारा शिक्षक होता है क्योंकि व्यवस्था करना सरकार और प्रशासन का कार्य होता है लेकिन स्कूल में आने वाले विद्यार्थियों के जीवन को संभालने की जवाबदारी शिक्षक की होती है उसी के ऊपर उसका सम्मान और आदर टिका रहता है। दर असल समाज में और किसी भी विभाग या वर्ग से इतनी अपेक्षा नहीं की जाती है जीतनी शिक्षक से की जाती है अंध विभाग के कर्मचारी सिर्फ अपना कर्तव्य निभाने के लिए होते हैं जिसके लिए वह रखे जाते हैं लेकिन शिक्षक की भूमिका इससे कुछ हटकर होती है यहां उसके कर्तव्य के साथ-साथ समाज और राष्ट्र निर्माण के दायित्वों की अपेक्षा रखी जाती है इसी के आधार पर उसका सम्मान निर्धारित होता है पुरातन काल में या यूं कह के गुरुकुल व्यवस्था के दरमियान जब पौराणिक व्यवस्था के अनुरूप शिक्षण व्यवस्था संचालित होती थी तब केवल और केवल गुरुकुल में आने वाले विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित रखते हुए शिक्षा प्रदान की जाती थी उसके चरित्र निर्माण मर्यादित आचरण और लक्ष्य आधारित शिक्षा को प्रधानता दी जाती थी जिसमें सम्मान और आदर भी एक प्रमुख प्रक्रिया होती थी चरण छूना गुरु का आदर करना उनकी प्रत्येक बात को आदर्श मानकर अमल करना दिए गए आदेश का पूर्णतया ईमानदारी से पालन करना यह उस व्यवस्था का श्रेष्ठतम परिदृश्य रहता था जो आज की पीढ़ी किताबों में वर्णित और संचार माध्यमों से जान पाए हैं लेकिन उसे व्यवस्था को स्वीकार करने में विश्वास कदापि नहीं रखते हैं। यही कारण है कि हमारे शैक्षणिक तंत्र की मान मर्यादाएं तर तर हो रही है न शिक्षक अपने दायित्व को समझ पा रहा है और ना ही विद्यार्थी अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है और तो और आज का पालक भी अत्यंत व्यावसायिक और जुगाड़ू बनता जा रहा है यही कहने मे हम संकोच करते हैं की वर्तमान समय में गिरते हुए शैक्षणिक हालातो के लिए तीनों ही बराबर से जिम्मेदार है लेकिन दोष केवल बेचारे शिक्षक को ही दिया जाता है।
इस विडंबना को दूर करने के लिए सरकार से अपेक्षा नहीं की जा सकती इसके लिए तो शिक्षक को ही कमर कसना होगी यह भी सत्य है कि आज का शिक्षक वर्तमान व्यवस्था से सबसे ज्यादा त्रस्त है वह बहुत कुछ करना चाहता है बदलना भी चाहता है छात्रों के जीवन को संवारना भी चाहता है लेकिन व्यवस्था का अभिशाप उसके मार्ग में आकर खड़ा हो जाता है स्कूल में अध्यापन कार्य के अलावा होने वाली अन्य सेवाएं उसे कुंठित कर रही है और इसी कारण वह अपने मूल कार्य से दूर होता जा रहा है जो उसके सम्मान और गरिमा को निरंतर रसातल में ले जा रहे हैं। जिसका परिणाम हम सब भोग रहे देश समाज परिवार मित्र संस्थाएं हमारा पूरा सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है कहा जाता है कि एक डॉक्टर की गलती से एक मरीज की मृत्यु होती है इंजीनियर की गलती से एक पुलिया टूट जाता है लेकिन एक शिक्षक की ना चाहते हुए गलती से पूरा समाज मर जाता है जिसका खामियाजा पूरी पीढ़ी उठाती है पूरी सदी उठाती है। लेकिन आज अनेकों प्रश्न उठ रहे हैं उस प्रतिष्ठित गरिमा को स्थापित करने का जिम्मा आखिर किसका है जो हमारे प्रगतिशील समाज की स्थापना के लिए अत्यंत आवश्यक है सरकार और सिस्टम हाथ बांधकर खड़े रहते हैं जबकि वे भी इसी व्यवस्था और समाज का हिस्सा है लेकिन उनके लिए अन्य उत्कृष्ट संस्थान बाहें फैला कर खड़े रहते हैं जो उन्हें की अनुकंपा से आबाद हो रहे हैं यह वर्ग विभाजन देश को अंधे कुए की ओर धकेल रहा है। डॉ राधाकृष्णन ने एक बार कहा था देश को लंबे समय तक जी गुलामी का शिकार होना पड़ा था उसके लिए तत्कालीन गुरु और शिक्षक भी जिम्मेदार माने जाते थे उनकी बात में निश्चित तौर पर सच्चाई का भाव था व्यवस्था को बदलने में शिक्षक की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है देश में एसे अनेको उदाहरण है जिसमें परिवर्तन की मशाले शिक्षकों के हाथों से प्रज्वलित हुई है । आवश्यकता इस बात की है कि हमारा शिक्षक जागृत हो बाधाओ को चुनौतिया मानकर हमारे आने वाले समाज का निर्माण करें और ऐसी पीढ़ी का साजन करें जिस पर पूरे देश और विश्व को गर्व हो तभी हम लोग विश्व गुरु बन पाएंगे और हमारी गरिमा और सम्मान अपने आप स्थापित होगा।