सामर्थ्य को पहचानो, विष को छोड़ो और आत्मा की ओर बढ़ो- मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी

नई दिल्ली। दलाल बाग में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने अपनी अमृतवाणी में धर्म, सामर्थ्य, आत्मबोध और सम्यक दृष्टि का गहन संदेश दिया।
महाराज श्री ने कहा कि धर्म असमर्थों का नहीं, समर्थों का मार्ग है। धर्म का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि अपनी सामर्थ्य को पहचानकर उसकी दिशा बदलना है। मनुष्य में जितनी शक्ति संसार के कार्यों, क्रोध, हिंसा, असत्य और अन्य विकारों में लगाने की क्षमता है, उतनी ही शक्ति को यदि अहिंसा, सत्य, क्षमा, संयम, विनय और आत्मकल्याण में लगाया जाए तो जीवन का वास्तविक रूपांतरण हो सकता है।
उन्होंने कहा कि अपनी शक्ति का “थर्मामीटर” लगाइए और स्वयं से पूछिए मेरे भीतर कितनी सामर्थ्य है? क्योंकि कमजोरी से किया गया त्याग महान नहीं होता; सामर्थ्य होते हुए गलत मार्ग को छोड़ना ही सच्चा त्याग है।
महाराज श्री ने आत्ममंथन कराते हुए कहा कि केवल वर्तमान जीवन को देखकर स्वयं को बहुत बड़ा धर्मात्मा मान लेना उचित नहीं है। जीव ने अनंत काल से संसार में अनेक प्रकार के राग, द्वेष, क्रोध, मोह और कषायों को भोगा है। इसलिए अपने दोषों को छिपाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना और उनसे बाहर निकलने का संकल्प लेना चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से समझाया जो अनंत बार कर चुके हो, उसे फिर क्यों दोहराना? संसार, राग-द्वेष और कषायों को बार-बार दोहराने के बजाय अब कुछ नया करने की आवश्यकता है। पूजा, अभिषेक, व्रत और मंदिर जाना महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके साथ यह भी देखना आवश्यक है कि हमारे भीतर क्रोध कितना कम हुआ, अहंकार कितना घटा और आत्मा की ओर हमारा उपयोग कितना बढ़ा।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दादू ने बताया कि मुनिश्री ने ज्ञान के अहंकार से बचने की प्रेरणा देते हुए ऋषभदेव और मारीच के प्रसंग के माध्यम से धर्म में पक्षपात से बचने की प्रेरणा दी। किसी एक गुरु के प्रति भक्ति रखते-रखते दूसरे गुरु की निंदा करना भक्ति नहीं, पक्षपात है। सम्यक दृष्टि व्यक्ति नहीं, गुण और सत्य को देखती है। गुरु में व्यक्ति से अधिक उनके गुणों को देखने और धर्म में अपने-पराए के भेद से ऊपर उठने की आवश्यकता है।
महाराज श्री ने अंत में अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी को पता चल जाए कि सामने रखे गिलास में जहर है, तो वह उसे पीने के लिए कल का इंतजार नहीं करेगा, बल्कि तुरंत फेंक देगा। उसी प्रकार जब हमें यह बोध हो जाए कि क्रोध, राग, द्वेष, अहंकार, लोभ और आसक्ति आत्मा के लिए विष हैं, तो उन्हें छोड़ने को कल पर क्यों टालना?
ज्ञान वही है जो निर्णय पैदा करे।
बोध वही है जो व्यवहार बदल दे।
त्याग वही है जो सत्य समझ में आते ही शुरू हो ।
धर्मसभा मे ब्रह्मचारी प्रदीप भैया,पारस भैया आनंद नवीन गोधा, चक्रवर्ती मनीष सपना गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष अशोक डोशी, हर्ष जैन, प्रिंसपाल टोंग्या,संजय पाटोदी मयंक जैन, डॉ जैनेन्द्र जैन भूपेंद्र जैन, कमल जैन विकास पाटोदी, अखिलेश सोधिया कमल अग्रवाल रानी डोषी, मुक्ता जैन,अर्चना गोधा सोनाली बगड़िया सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी एवं समाज जन उपस्थित थे।

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