
राजगीर। बिहार के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल राजगीर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर कोठी नौलखा मंदिर के प्रांगण में जैन संत लौह पुरुष सोहम् मुनि जी महाराज साहब ने केश लोच किया ।
इस अवसर पर संत श्री ने कहा कि जैन धर्म में केश लोच संतों और आर्यिकाओं द्वारा शरीर और सुंदरता के प्रति मोह त्यागने की सबसे कठिन तपस्या है। इस प्रक्रिया में जैन संत और साध्वी अपने सिर, दाढ़ी और मूंछों के बाल उस्तरा या कैंची से कटवाने के बजाय अपने हाथों से खींचकर उखाड़ते हैं। यह जैन संतों के 28 मूल गुणों में अनिवार्य है। यह क्रिया आमतौर पर वर्ष में 2 से 4 बार की जाती है।
केश लोच के मुख्य उद्देश्य अहिंसा का पालन करना है कैंची या उस्तरे से सूक्ष्म जीवों की हिंसा हो सकती है, इसलिए हाथ से केश निकाले जाते हैं। इसका उद्देश्य शरीर की सुंदरता के प्रति मोह खत्म कर आत्मा की सुंदरता को निखारना है साथ ही सहनशीलता और तप को बढ़ावा देता है यह ‘कायक्लेश’ तप का हिस्सा है, जो दर्द सहने और इंद्रियों पर विजय का प्रतीक है।
जैन साधु धन और परावलंबन से दूर रहते हैं। बताते चले कि इस दौरान संत बिना किसी पीड़ा के भाव के शांत मुद्रा में रहते हैं और मन में कर्मों की निर्जरा का चिंतन करते हैं।
जैन शास्त्रों में कहा गया है कि एक जैन साधु को केश लोच करते हुए देखने से 100 जिनालयों के दर्शन जितना पुण्य मिलता है। इसे विश्व की सबसे कठिन साधनाओं में से एक माना जाता है।
मौके पर पेटरवार झारखंड से पधारे भुनेश्वर महतो, श्वेतांबर कोठी के सहायक प्रबंधक ज्ञानेंद्र पाण्डेय, कैशियर संजीव कुमार जैन, समाजसेवी अनिता कुमारी गुप्ता, रमेश कुमार पान, सुबोध कुमार, सहित अन्य लोग उपस्थित थे ।