
इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने आज शुक्रवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में परिस्थितियों से अधिक महत्वपूर्ण हमारा दृष्टिकोण होता है। दृष्टिकोण बदलते ही परिस्थितियों को देखने और समझने का तरीका बदल जाता है। सकारात्मक दृष्टि कठिन परिस्थितियों में भी समाधान और कल्याण का मार्ग दिखाती है, जबकि नकारात्मक दृष्टि सुख-सुविधाओं में भी कमी खोज लेती है।
महाराज श्री के आज के प्रवचन से जीवन की दिशा और दशा बदलने और ढोंग का नहीं ढंग का जीवन जीने की प्रेरणा प्राप्त हो रही थीं।मनुष्य के जीवन को आज हम जिन जीवन मूल्यों से संस्कारित करने का स्वप्न देखते हैं उन्ही शांतिप्रिय, वात्सल्य एवं सद्भावना से परिपूर्ण, धर्म समाज संस्कृति और परिवार के प्रति सद्भावना से परिपूर्ण जीवन मूल्यों की अनुगू़ज सुनाई दे रही थी । मुनि श्री ने कहा कि संसार में किसी वस्तु या परिस्थिति को केवल अच्छा अथवा बुरा मान लेना उचित नहीं है। हमारी दृष्टि और भावना ही उसके अनुभव को निर्धारित करती है। सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति विरोधी में भी आत्मीयता देख सकता है। ज्ञानी व्यक्ति किसी को अपना स्थायी शत्रु नहीं मानता, उसके जीवन में मैत्री, विनम्रता और करुणा का भाव रहता है।
एक गलत कर्म वर्षों की कमाई पर भारी पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में अनेक अच्छे कार्य करता है, पुण्य अर्जित करता है और समाज में प्रतिष्ठा बनाता है, लेकिन एक गंभीर गलत कर्म वर्षों की कमाई और प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकता है।
धन और पुण्य की चर्चा करते हुए महाश्रमण ने कहा कि धन बुरा नहीं है और पुण्य भी बुरा नहीं है। गृहस्थ जीवन में धन और संसाधनों की आवश्यकता होती है, लेकिन इनके साथ यदि लोभ, अहंकार, अत्यधिक भोग और गलत इच्छाएँ बढ़ने लगें तो यही सामर्थ्य व्यक्ति के पतन का कारण बन सकती है।
उन्होंने कहा कि धन और पुण्य मिलने के बाद व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि उसकी इच्छाएँ बढ़ रही हैं या धर्म और विवेक। सामर्थ्य का उपयोग यदि आत्मकल्याण, सेवा और धर्म के लिए होता है तो उसका जीवन सार्थक बनता है।
महाराज श्री ने परिवारों को संदेश देते हुए कहा कि धर्मात्मा जीवनसाथी परिवार की सबसे बड़ी संपत्ति है। यदि किसी परिवार का पति, पिता, भाई या कोई अन्य सदस्य ईमानदारी से जीवन जीता है, गलत कमाई और अनैतिक साधनों से दूर रहता है, तो परिवार को उसकी आर्थिक सीमाओं की शिकायत करने के बजाय उस पर गर्व करना चाहिए।
दूसरों के बड़े मकान, गाड़ी और वैभव को देखकर अपने ईमानदार जीवनसाथी को कमतर नहीं आंकना चाहिए। उन्होंने कहा कि कभी-कभी आर्थिक अभाव भी व्यक्ति को अनेक गलत कार्यों और गलत इच्छाओं से बचाने वाला कारण बन सकता है।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में धन मिले तो अहंकार नहीं, विवेक बढ़ना चाहिए; पुण्य मिले तो भोग नहीं, धर्म बढ़ना चाहिए और सामर्थ्य मिले तो पाप करने की शक्ति नहीं, पाप से बचने की शक्ति बढ़नी चाहिए
मीडिया मेन राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्मसभा में आलोक आकाश कोल संजय पाटोदी नवीन आनंद गोधा, अशोक डोषी भूपेंद्र जैन, स्वदेश गुरुजी, अखिलेश सोधिया, गिरीश गिन्नी,विपुल बांझल, श्रीमती मुक्ता जैन
कुणाल सोहिता कासलीवाल प्रीतम पूर्वा पाटनी,सविता पवन मोदी, ब्रह्मचारिणी सविता दीदी, ब्रह्मचारी पारस भैया आदि गणमान्य उपस्थित थे।