
इंदौर। पुस्तकों से मनुष्य का गहरा नाता है। डिजिटल दौर में किताब का महत्व जरूर कम हुआ है, लेकिन पुस्तकों का महत्व कम नहीं हुआ है। व्यंग्य और कविता अलग-अलग विधा जरूर है लेकिन दोनों में जीवन का ऑब्जरवेशन निहित है। यह बात सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ प्रेमचंद द्वितीय ने पुस्तक चर्चा एवं काव्य संगोष्ठी समारोह में कही। प्रारम्भ में डॉ प्रेमचंद द्वितीय का स्वागत कवि, लेखक व समीक्षक संजय एम तराणेकर ने किया।
दिवंगत कवि कल्याण सिंह केसर की स्मृति में अखिल भारतीय संस्था विद्योत्तमा द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अखिलेश राव और मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेमचंद द्वितीय एवं सारस्वत अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार एवं अधिवक्ता प्रवीण चौधरी उपस्थित थे। उनके एवं गोपाल सिंह राजपूत के द्वारा दिवंगत कवि एवं पुस्तक के बारे में चर्चा की गई। चर्चा में भाग लेते समय वे भावुक भी हो गए। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर महत्वपूर्ण सारगर्भित व्याख्यान दिया गया। यह आयोजन इंदौर इकाई के अध्यक्ष दिनेश तिवारी द्वारा किया गया। इस अभिनव आयोजन की शुरुआत डॉ शशि निगम द्वारा सरस्वती वंदना से की गई। कुशल संयोजन कल्याणी गुप्ता द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार संध्या बाईवार, डॉ इंदु जैन, सुरेश माहेश्वरी शिवम, हरीश हंस, संजय एम तराणेकर, डॉ अर्चना त्रिवेदी, शीला चंदन, स्वाति सिंह, तेजकरण दुबे द्वारा काव्यपाठ किया गया। यह जानकारी हरिहर सिंह चौहान ने दी।