हिन्दी दिवस विशेष – व्यंग्य
(संजय एम तराणेकर)

अपनी हिंदी की तो बात ही निराली है। जिस देश में हिंदी फिल्मों के कलाकार हिंदी में अभिनय करके करोड़ों कमाते हैं, उसी देश में इंटरव्यू देने बैठते ही उनकी हिंदी अचानक छुट्टी पर चली जाती है और अंग्रेज़ी नौकरी पर हाज़िर हो जाती है। फिल्म हिंदी की, संवाद हिंदी के, दर्शक हिंदी वाले, तालियाँ हिंदी में…लेकिन जैसे ही कैमरा इंटरव्यू के लिए घूमता है—“Well… I think… basically… you know…”और दर्शक सोचता रह जाता है-भाई, फिल्म में तो तुम हिंदी बोल रहे थे, यहाँ कौन-सी फिल्म चल रही है? कुछ सितारों को तो अंग्रेज़ी बोलते देखकर ऐसा लगता है जैसे हिंदी बोलना उनके स्टारडम के स्तर से नीचे की चीज हो।
हिंदी में सवाल पूछो तो चेहरे पर ऐसी गंभीरता आ जाती है, जैसे पत्रकार ने उनसे “आयकर विभाग” की पूरी “फाइल” माँग ली हो। उनकी आंख से आंख मिलाकर देखो तो ऐसा लगता है जैसे कोई गुनाह कर दिया हो। लेकिन अंग्रेज़ी में सवाल आया नहीं कि मुस्कान खिल के चौड़ी हो उठती है—“Absolutely! I completely agree…और I know-2 जैसे शब्दों का रिपीटेशन हो जाता है।” भाई, आपसे पूछा क्या गया था और आपने जवाब क्या दिया? मजेदार बात यह है कि जिस हिंदी फिल्म के प्रचार के लिए इंटरव्यू हो रहा है, उसी इंटरव्यू में हिंदी को किनारे कर अंग्रेज़ी की लाल कालीन बिछा दी जाती है। फिल्म का नाम हिंदी, पोस्टर हिंदी, गाने हिंदी, कहानी हिंदी…बस कलाकार का इंटरव्यू अंग्रेज़ी में! शायद उन्हें लगता है कि हिंदी में बोलेंगे तो स्टार कम और आम आदमी ज्यादा लगेंगे। उन्हें ऐसा लगता हैं कि अंग्रेजी बोलने से उनका स्टैंडर्ड मेंटेन हो जाता है। अंग्रेज़ी में दो-चार वाक्य बोलते ही उन्हें लगता है कि व्यक्तित्व में साबुन की तरह निखार के साथ अंतरराष्ट्रीय चमक आ गई हैं और हमारे एंकर भी कमाल करते हैं। हिंदी चैनल पर हिंदी फिल्म के कलाकार को बुलाकर पहला सवाल अंग्रेज़ी में पूछेंगे। कलाकार अंग्रेज़ी में जवाब देगा। फिर एंकर हिंदी में उसका मतलब बताएगा। दर्शक टीवी के सामने बैठकर सोचता है-“जब दोनों को हिंदी आती है तो बीच में यह अंग्रेज़ी किस खुशी में टपक गईं?”
यह अंग्रेज़ी से विरोध नहीं है। अंग्रेज़ी सीखिए, बोलिए, दुनिया घूमिए-किसी को आपत्ति नहीं। लेकिन जिस भाषा के नाम पर पहचान, लोकप्रियता और कमाई मिली हो, उसके प्रति सहजता और सम्मान भी तो दिखना चाहिए। हिंदी में बोलना पिछड़ापन नहीं है और अंग्रेज़ी बोलना कहीं से कहीं तक आधुनिकता का प्रमाण भी नहीं हो सकता।असल में आधुनिकता तो यह है कि आप जिस भाषा में सहज हों, उसमें बिना “हीन भावना” के बात कर सकें।
वरना स्थिति यही रहेगी-हिंदी फिल्में बनेंगी हिंदी में,
हिंदी से ही इनकी कमाई होगी, तालियाँ भी मिलेंगी हिंदी वालों से और इंटरव्यू होगा अंग्रेज़ी में! वाह रे… हिंदी सिनेमा! तेरी कमाई हिंदी की, तेरी पहचान हिंदी की, तेरे दर्शक हिंदी के-बस तेरे सितारों की जुबान… इंटरव्यू आते ही विदेशी हो जाती है!
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986